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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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विश्वगाँव में हिन्दी बैठी है सड़क किनारे

Posted On: 9 Aug, 2015 social issues,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
हिन्दी आज उदास है,
थकी, बैठी और छुब्ध है!
हिन्दी को आज पीड़ा औरों ने नहीं,
उसके ही अपनों ने दी है!
रुलाया भी तो स्वजनों ही ने!!
एक समय था, देश गुलाम था,
पैरो में चप्पल नहीं, तन पर वस्त्र नहीं,
रहने को छत नहीं, खाने को अन्न नहीं,
अपने ही देश में गैर थे हम!!
तब सदियों से चली आती
संस्कृत की बेटी हिन्दी ने
पूरे देश को एक भाषा की छत दी!
चौहद्दी में बँटा भारत हिन्दुस्तान बना!!
‘जय हिन्द’ बना!
‘मेड इन इण्डिया’ और ‘मेक इन इण्डिया’ बना!
हिन्दी की गीता, हिन्दी की कुरआन,
हिन्दी की बाइबिल, हिन्दी की गुरुवाणी ने
देश में आज़ादी की अलख जगाई!!
सभी छोटी-बड़ी भाषाएँ,
हिन्दी में समर्पित होकर हिन्दुस्तानी बनी !!!
इस मटियारी हिन्दी ने,
देश की आज़ादी का सूर्योदय देखा!
लाल किले पर तिरंगा फहरते देखा
संविधान को बनाते हुए देखा!
बड़ा सम्मान था,
तब के भारत में, संविधान में हिन्दी का!
पर इन आजाद वर्षों में,
नयी पीढ़ियाँ हिन्दी को नहीं पहचानती !!
जानती भी हैं तो थोड़ा-थोड़ा!
पुरखों ने तो हिन्दी के लिए
सब कुछ दाव पर लगाकर राष्ट्रनिर्माण किया
और अनुच्छेद 343 (देश की राजभाषा) बनाया।
पर, हिन्दी के, हिन्दुस्तान के वारिस बासिन्दे ही
हिन्दी को पिछियाए हुए हैं!
हिन्दी रूक कर,
हिन्दी थक कर
बैठी है सड़क किनारे!!
उसे किसी ने बताया है कि
दूर कहीं पर
हिन्दी का विश्वगाँव बन रहा है !!!
[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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