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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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आरक्षण एक नासूर

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_इंसानियत के मौलिक अधिकारों का दमन है आरक्षण। देश के किसी भी व्यक्ति के मौलिक हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। भारत में वैमनस्यता की जड़ें आरक्षण से निकलती है, यह बात वैश्विक परिदृश्य में स्थापित हो चुकी है। हमारी बिरदारियाँ कह रहीं हैं कि- हम आहिस्ता-आहिस्ता एक अंतहीन नफ़रत की तरफ बढ़ रहे हैं। बहुबातों के बवंडर में भारत की सवर्ण रणनीति पर लम्बी ख़ामोशी है।

जातिगत आरक्षण देश की अखंडता के विरुद्ध एक राजनीतिक षड़यंत्र है। ग़रीबी दूर करने संबंधी सरकारी योजनाओं की कोई कमी नही है और इसमें जाति कहीं से आड़े नहीं आती। भारतीय विश्वगाँव के आँगन में आरक्षण एक नासूर बनता जा रहा है। अतीत के शोषण के नाम पर वर्त्तमान का आरक्षण आज के हितों का अपमान है अब। सभी को ‘रोटी-पेयजल-कपड़ा-मकान-शिक्षा’ की गारंटी के बदले ‘आरक्षण’ की जंग असामाजिक माँग है। आरक्षण की तलवारों ने भारत की तरक्की को कई भाग में बाँट दिया है। आरक्षण के कुनबों में अखंड भारत खंड-खंड नहीं किया जा सकता। अब सभी प्रकार के आरक्षण बंद करने का समय आ गया है। बात ईमान की कही जाय तो इस आरक्षण की बैसाखी में आज ब्राह्मण-भूमिहार-क्षत्रीय-कायस्थ आदि सवर्ण पिछड़ चुका है।

जातियों के सूचीकरण का एक युगीन इतिहास है। “मनु स्मृति” जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जाति एक “वर्णाश्रम धर्म” है, जिसका अर्थ हुआ “वर्ग या उपजीविका के अनुसार पदों का दिया जाना”. भारत में जाति प्रथा ने इस नियम का पालन किया। मनु के साथ हमारे इतिहास के प्रारंभिक काल से जातियों के सूचीकरण की शुरुआत होती है। मध्ययुगीन इतिहास में देश के विभिन्न भागों में स्थित समुदायों के विवरण मिलते हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, 1806 के बाद व्यापक पैमाने पर सूचीकरण का काम किया गया था। 1881 से 1931 के बीच जनगणना के समय इस प्रक्रिया में तेजी आई।

‘शुरुआत से लेकर अब तक के सभी समाजों का इतिहास, वस्तुतः वर्ग–संघर्ष का इतिहास रहा है.’ (कार्ल मार्क्स, द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, चैप्टर-1) कार्ल मार्क्स ने सामाजिक पिछड़ेपन और भेदभाव के आकलन में आर्थिक अवस्था यानी वर्ग को ही मानदंड माना था। पर भारत में गांधी और लोहिया ने पिछड़ेपन के आकलन के लिए जाति व वर्ण के महत्व को महत्वपूर्ण माना। अभिज्ञेय समूहों का कम-प्रतिनिधित्व भारतीय जाति व्यवस्था की विरासत है। स्वतंत्र भारत के संविधान ने पहले के कुछ समूहों को अनुसूचित जाति (अजा) और अनुसूचित जनजाति (अजजा) के रूप में सूचीबद्ध किया। संविधान निर्माताओं की सोच थी कि – जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से दलित रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया जिस कारण राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी कम रही। संविधान ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की खाली सीटों तथा सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में पांच वर्षों के लिए आरक्षण रखा था, उसके बाद हालात की समीक्षा किया जाना तय था। यह अवधि नियमित रूप से अनुवर्ती सरकारों द्वारा बढ़ा दी जाती रही. और बाद में, अन्य वर्गों के लिए भी आरक्षण शुरू किया गया जो सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार 50% से अधिक का आरक्षण नहीं हो सकता।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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