कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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काशी का काला दिन और काली रात

Posted On: 7 Nov, 2015 social issues में

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[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_लोक संस्कृतियों का देश है भारत, जिसकी काशी मे दुनिया की सभी सभ्यताओं के नागरिक निवास करते हैं। पुश्तैनी रीती-रिवाजों का एक विशाल आँगन है, जिसमे पीढ़ियों की संस्कृतियाँ बसती हैं। बनारस की बदहाल गलियों में सांस्कृतिक सन्नाटा पसर गया। सदियों पुरानी परम्पराओं ने दम तोड़ दिया। तथाकथित आधुनिक क्योटो बनारस और विश्व के प्राचीनतम जिन्दा शहर काशी में श्रद्धालुओं की आस्था पर कुठाराघात किया गया, माँ दुर्गा की प्रतिमा को पर्यावरण, प्रदूषण के नाम पर गंगा मईया से मिलने से रोक दिया गया। कहा तो ’नमामि गंगा’ था यह कैसा ’नमन’ किया माँ गंगा को। यहाँ की गलियों के पंडालों से बरस दर बरस माँ दुर्गा की सैकड़ों प्रतिमाएं हर्षोल्लास के साथ विसर्जन हेतु माँ गंगा में समाहित होने निकला करती थीं। लोकघोष ’ए हो, का हो, दुर्गा मैया की जय हो’ का विसर्जन इस बार काशी के मृतप्राय कुंडों में कर दिया गया। गंगा की मिटटी और गंगा ही के पानी से सनी-बनी मूर्ति तो बहुत दूर, माननीय उच्च न्यायालय के अनुपालन में नवरात्रि में स्थापित कलश में भरे गंगाजल को भी विसर्जित करने की अनुमति नहीं दी जिला प्रशासन ने। क्या गंगा में केवल मूर्ति विसर्जन रोक लेने से गंगा शुद्ध हो जाएगी! सीवर के मल जल, टेनरीज, डिस्टलरीज, सुगर मिल और अन्य उद्योगों, कारखानों के सीधे गंगा में गिरने वाले कचरा से निर्मली करण के वैभव से गंगा पवित्र हो जाएगी! गंगा में कुछ धार्मिक अवसरों पर मूर्ति विसर्जन को हर कीमत पर रोक लेने में गर्व महसूस करने वाली सरकारी मशीनरी द्वारा हर-पल हर-दिन-रात गंगा में कचड़ों और विषैले अपशिष्ट मिलाये जाने पर गहरी खामोशी है। देश का पर्यावरणविदों का गहरे सन्नाटे में गंगा तो निर्मल कर न सके और कुंडो तालाबों को प्रदूषित कर दिया। गंगा शुद्धीकरण के नाम पर यह कैसा अधर्म!

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शहर बनारस में लगभग दो दर्जन गणेश प्रतिमाएं स्थापित होती हैं, जिसमें मराठा गणेश उत्सव समिति पिछले 25 वर्षों से गणेश प्रतिमा स्थापित करती है। इसी अनुक्रम में संदर्भित समिति द्वारा इस वर्ष 2015 में भी गणेश प्रतिमा स्थापित की गयी। दिनांक 21.09.2015 को पुलिस की देख-रेख में उक्त प्रतिमा पंडाल से विसर्जन के लिए निकली। पंडाल स्थल से चल चुकी मूर्ति विसर्जन की यात्रा अचानक गंगा घाट के थोड़ी दूर पहले गोदौलिया चौराहे पर रोक ली गयी। जिससे मराठा समाज और समिति के लोग विरोध करते हुवे बैठ गए। चूँकि विषय आस्था का था, इस कारण धीरे-धीरे शहर के नागरिक, विभिन्न विचारधारा, विभिन्न दलों के प्रतिनिधि, सामाजिक संगठनों के लोग, बौद्धिक समुदाय, विभिन्न धार्मिक भावनाओं आदि के लोग गोदौलिया चौराहा पहुँचने लगे। 24 घंटे तक सड़क पर गणेश प्रतिमा के खड़े रहने पर व्याकुल हो कर सनातन धर्म के धर्माचार्य नन्हे बटुकों, अपने गुरु भाइयों और शिष्यों के साथ गोदौलिया पहुंचे। और गंगा में मूर्ति विसर्जन न होने से व्यथित होकर गणेश प्रतिमा के समक्ष धरने पर बैठ गए। 97 करोड़ लोगों की आस्था भगवान श्री गणेश में है। उन्हें 36 घंटे सड़क पर खड़े रखा गया। करीब 36 घंटे बाद 23 सितम्बर 2015 को मध्यरात्रि (01:15 am) पर मानव अधिकारों का हनन करते हुवे पुलिस प्रशासन ने मासूम बच्चों, बटुकों पर लाठीचार्ज का आदेश कर दिया। संतों, गुरु-भाइयों पर पुलिसिया बर्बरता के साथ प्राण घातक प्रहार किया गया। तदुपरांत 23 सितम्बर 2015 को मध्य रात्रि के (2:55) पर जूता पहने पुलिसकर्मी गणेश प्रतिमा को नगर निगम के कूड़ा वाले ट्रक पर रख कर लक्ष्मी कुण्ड में पवार दिया। इसके बाद मूर्ति कहीं अज्ञात स्थान पर फेंक दिया।
सुना था काशी में भगवान शंकर ब्राह्ममुहूर्त में (रातभर) विचरण करते हैं! लगभग 23,000 मंदिरों वाले बाबा विश्वनाथ की मोक्ष नगरी काशी में, पावन गंगा के सदियों पुराने तट पर काल-महाकाल का धार्मिक शहर बनारस में ‘सचल-विश्वनाथ’ पर प्रहार से ‘सुबहे-बनारस’ कलंकित होगया। बाबा काल भैरव क्रोधित हैं। शंकर के शहर में, माँ अन्नपूर्णा के आँगन में भावी शंकराचार्य पर बर्बरता, इससे ज्यादा कलंक कुछ नहीं। भगवान शंकर को कैद में रखने वाले भावी शंकराचार्य पर बर्बरता करते रहे। आधी रात में बेगुनाह बटुकों, बच्चों साधु संतो पर बेरहमी से लाठियाँ बरसा कर मानव अधिकारों का उलंघन करते हुवे वर्दी को कलंकित किया गया! सनातन धर्म की वैदिक परम्पराओं से छेड़ छाड़ कर आस्था को चोटिल किया गया है। संतों और सनातन धर्मियों का उत्पीड़न किया गया। ’जय हिन्द’ पर प्रहार किया गया! काशी की काली रात में महादेव के चौराहे पर धर्म के संप्रतीक के प्रति ’परित्राणाय साधूनाम’ को घनी रात में घेर कर लाठियों से लहूलुहान कर ’राष्ट्रधर्म’ को चुनौती दिया गया। मध्य निशा में छाती चौड़ी किये अपना दोनों हाँथ फैलाये ‘धर्मराज’ वीरता से खड़े रहे और सरकारी डंडा अपना तांडव करता रहा। ‘वसुधैव-कुटुम्बकम’ के आँगन में निहत्थे सन्यासी पर प्रहार किया गया। धर्म को लहूलुहान किया गया! आस्था को चोटिल किया गया! भगवान को पवारा गया! ‘अहम्-ब्रम्हास्मि’ के देश में धर्म से बड़ा ‘कुकर्म’ हो गया! ‘सहनाववतु’ के देश में अनीत-अन्याय करना, राष्ट्रीय धर्म होता जा रहा है! सचल विश्वनाथ पर प्रहार से बाबा कालभैरव क्रोधित हैं! ‘पवित्र दंड’ के अपमान के लिए गोदौलिया के सभासद, गोदौलिया के मेयर, गोदौलिया के विधायक, गोदौलिया के सांसद (जनप्रतिनिधि), गोदौलिया के मुख्यमंत्री, गोदौलिया के प्रधानमंत्री (सरकार) अगर दोषी नहीं तो निर्दोष भी नहीं, क्यूंकि धर्म के आँगन में अधर्म होगया। यही ’स्मार्ट सिटी’ बनारस होगा जहाँ ’सूट बूट’ घेर कर धर्म ’गेरुवा’ को लहूलुहान करेगी।

बुद्ध का बदहाल बनारस, कबीर के उजड़े ताने-बाने का झीना शहर, तुलसी की तपस्थली, रविदास की प्रयोग-भूमि, महामना की तपोभूमि बनारस रोती हुवी गलियों में पिछड़-बिछुड़-बिखर-ठिठक कर तड़प रहा है। महामंत्रों के महानगर में सियापा पसर रहा है। 80 घाटों के इर्द-गिर्द 30 नालों, 3 ट्रीटमेंट प्लांट, छत विहीन दो महाशमशान पर बनारस की मिटटी और यहीं के पानी से सनी मूर्तियाँ अपनी माँ गंगा में समाहित होने को बेचैन है। धार्मिक भावनाओं की खड़ी फसल काटने वाली ताकतें फिर से काशी की भावनात्मक फसल उतारने की बाट जोह रहे हैं। रुका हुवा बनारस धार्मिक ब्याज भरता ही जा रहा है। गंगा में तो सदियाँ विसर्जित हुवी हैं! जनभावनाओं की सनातन नगरी काशी और राजनीतिक लालसाओं का काबा बनारस, राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार हो अपनी दुर्दशा से तड़प रहा एक रुका हुवा शहर है भारत का। भटक गया है भारत! थम गया जनहित! भारत दुनिया से जीत कर भी घर के चप्पे-चप्पे पर हार रहा है। ‘सोने की चिड़िया’ था देश, जिसकी सरकार अब ‘ट्वीटर’ पर ‘चहकती’ है। ‘ट्वीटर’ पर ‘चहचहाने’ वाली यह सरकार बुनियादी मुंडेर से कतरा जाती है अकसर। लगता है भारत का ‘मूल-धर्म’ चोरी हो गया, क्यूंकि जनहित से बड़ा ‘धर्म-विरोध’ हो गया।
माननीय उच्च न्यायलय के आदेश दिनांक 07 अक्टूबर 2013 का अनुपालन जिला प्रशासन आज दो वर्षों बाद 22 सितम्बर 2015 को किया। इस दो वर्षों के अंतराल में चित्रगुप्त प्रतिमा, दुर्गा प्रतिमा, सरस्वती प्रतिमा, विश्वकर्मा प्रतिमा, आदि आदि अनेक आस्था की प्रतिमाओं का सीधे गंगा में विसर्जन किया गया। फिर अचानक ऐसी क्या मजबूरियाँ आ गयी, किसका प्रभाव आ गया, कि प्रशासन को मानव अधिकारों का उलंघन करना पड़ा। और धार को नामजद करना पड़ा।

काशी में आक्रोश था ! आस्था मर्माहत थी ! धार्मिक उन्माद भी सुलगाया जा रहा था। सनातन धर्म की वैदिक परम्पराओं से छेड़-छाड़ से आस्था हतप्रभ है। संतों और सनातन धर्मियों का उत्पीड़न क्रमबद्ध है। अहिंसा जिसकी पृष्ठभूमि है! अमन जिसका इतिहास है, उसे शांति विरोधी और आपराधिक धाराओ पाबन्द करना बाबा विश्वनाथ को समर्पित ऐतिहासिक पद यात्रा को भटकाने का षड्यंत्र चल पड़ा। सभी दलों के जनप्रतिनिधि साथ थे पर उन्हें पाबंद नहीं किया गया। रागद्वेष से संलिप्त आचरण कर कांग्रेस और शंकराचार्य जी के शिष्यों पर संगीन मुकदमों से शांति, न्याय और धर्म स्तब्ध है। इसी क्रम में संतों ने ’काशी पर लाठी:अन्याय प्रतिकार यात्रा’ का आह्वान किया जिससे शांति और अहिंसा के साथ प्रतिकार किया जा सके। ’काशी पर लाठी: अन्याय प्रतिकार यात्रा’ में उमड़े ऐतिहासिक जन-सैलाब से हतोत्साहित अमन-चैन विरोधी ताकतों ने इस जन-यात्रा में खलल पहुँचाया। बाबा विश्वनाथ को समर्पित इस पद यात्रा को कुछ ताकतों ने भटकाने की कोशिशें की। धर्म यात्रियों के पहुँचने से पहिले ही यह दुर्भाग्य पूर्ण घटना घटित हुवी। इससे शांति, न्याय और धर्म स्तब्ध है। ‘जिसके नाथ विश्वनाथ वो अनाथ कैसे!’ पीड़ा के इस आक्रोश क्रंदन में ‘सनातन-धर्मियों’ ने आस्था के सवालों पर बाबा विश्वनाथ के नेतृत्व में ‘काशी पर लाठी: अन्याय प्रतिकार यात्रा’ के माध्यम से सविनय अहिंसा के संस्कार में अपनी आध्यात्मिक पीड़ा दर्ज कराने का प्रयास किया। अन्याय प्रतिकार यात्रा का नेतृत्व बाबा विश्वनाथ कर रहे थे। उन्ही की अगुवाई में यह अद्भुत शांति-यात्रा को कुछ उपद्रवियों ने दिशा ही बदल दी।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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