कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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मैं खामोश बनारस हूँ

Posted On: 24 Nov, 2015 social issues में

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[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]
मैं खामोश बनारस हूँ,
आज बोल पड़ा सहसा!
मेरे हिस्से सब चिल्लाते,
सबके हिस्से की मै शांत लहर हूँ!!

गलियों में मैला-कुचैला सा,
अंधियारी रातों में सिमटा सा,
दिन के अल्हड उजियारे में,
सडकों पर जख्मी उधड़ा सा,
आहत हतप्रभ शेष बनारस हूँ!!
पन्नों का नगर यह,
सदियों से जिन्दा है!
कलमों पर कलमें उगती,
स्याही भी कहाँ चुकने वाली!!
कागज की किश्ती पर,
लाशें यहाँ जिन्दा हैं!
पत्थर की गलियों में,
इतिहास यहाँ घूमे!!
साहित्य यहीं पनपा,
भाषाएँ बोई जाती!
धर्म यहीं जन्मे,
भगवान यहाँ जागे,
इंसान यहाँ सोया!!
स्याही पीकर कलमो ने,
कागज़ पर जीवन बोया!
हर्फ़ यहाँ अल्फाजों संग,
जिल्दों के आँचल में सोया!!
पंथ हजारों कई सदियों से,
आकर खुद को सँवारा है!
प्यासी सदियों को पीकर
प्यास बुझाया सदियों का!!

मरघट के कोलाहल में,
जलती अग्नि जिन्दा है!
रिश्तों की दुनियादारी पर.
मरण यंत्र शर्मिंदा है!!
बूढ़ी सदियों संग
पुश्तों के अवशेष लपेटे,
पुरुखों की ख़ाक सहेज बनारस
पीढ़ी दर पीढ़ी जिन्दा है॥
[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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OM DIKSHIT के द्वारा
November 25, 2015

चतुर्वेदी जी ,नमस्कार. बहुत सुन्दर पंक्तियाँ.


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