कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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उस गंगा का उत्सव कैसा जिसके बेटों पर गंगा का दोष मढ़ा हो!

Posted On: 25 Nov, 2015 social issues में

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[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_घाटों के उजाले से गंगा का अँधेरा कम नहीं होगा! काशी का काला दिन और काली रात अभी खत्म नहीं हुवी और अंतहीन अंधेरों भरी काशी की एक शाम को प्रकाशित किया जा रहा! उस गंगा की अनदेखी का यह कैसा उत्सव है, जिसके बेटों पर गंगा का दोष मढ़ा हो!
आज सभी अपनी कामनायें लेकर गंगा के पास पहुँच रहे हैं! पर गंगा मईया अपनी संतानों को लेकर व्याकुल हैं!खामोश लहर गंगा तट पर मंथर, सुस्त और खिन्न है, हर आने वाले में अपनी निर्दोष संतानों को निहार रही है! पर बेबस गंगा, उसे पता है कि आज उसके वे बेटे नहीं आएंगे! और रौशनी का दिया नहीं जलाएंगे! उन्हें तो गंगा की ही तरह गुमनाम अन्धरों की तरफ धकेल दिया गया है! गंगा के बेटे गंगा से दूर बहुत, न जाने कब गोद गंगा की मिलेगी। अन्याय के अंधेरों में गंगा परिवार का कोई भी सदस्य न दीवाली मनाया और न ही देव दीवाली मना रहा!यह बड़े प्रकाश के पहले वैमनष्यता भरे घने अँधेरे का कठिन समय है!
गंगा के सवाल अभी ख़त्म नहीं हुवे! बनारस में नागरिक मूल्यों सहित लोकतान्त्रिक,आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक भेदभाव, नफ़रत के विकास का आपातकाल चल रहा है! जो कानून को माता-पिता का दर्जा देते हैं और देश को परिवार जैसा प्यार देते हैं! जो राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय नदी की गरिमा के लिए आत्मार्पित रहते हैं, उन्हें कानून की धाराओ का दुर्प्रयोग कर असहिष्णुता द्वारा मानसिक और बौद्धिक छति पहुँचाया जा रहा है! देव दीवाली यह सबकुछ देख रही है और कहना चाहती है कि ‘हर दिया प्रकाश के लिए है! किसी भी दिए से देश को मत जलाओ। देश है तब तुम हो!’
गंगा पर महाभारत से गंगा और उसकी संतानें आहत हैं! पवित्र गंगा राजनीति की विषयवस्तु कभी नहीं रहीं! भारत में कई सल्तनतों को बनते और कई को बिखरते देखा है गंगा ने। जो आवाज गंगा की आवाज से न जुड़ पाये उस आवाज को समय की लहरें अपनी धारा में बहा ले जाती हैं! आस्था का पावन तट सामाजिक दुर्भावनाओं से मलीन हो जाता है!_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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