कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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काशी में अघोषित आपातकाल

Posted On: 29 Nov, 2015 social issues में

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_”धर्म की रक्षा करने को, प्रतिकार यात्रा हमने की ! बस दोष हमारा इतना था, कि गंगा मेरी माता थी !!” न गंगा लावारिस है न उसकी संताने अनाथ! गंगा तो हमारी धमनियों में खून बनकर धड़कनों में दौड़ रही है! गंगा के पवित्र जल से खून का कतरा-कतरा गंगा की आजादी के लिए समर्पित है हमारा! इस जीवन में गंगा से उसकी संतानों को बिलगाना संभव नहीं। असहिष्णुता का प्राथमिक शिकार देश का प्रथम संसदीय क्षेत्र काशी और उत्पीड़ित गंगा के बेटे हैं। नफ़रत की सियासत और भय के चरमपंथ की असहिष्णुता ने गंगा के निरपराध बेटों के नाम के साथ अपराधी शब्द लिखवा दिया। काशी के आदर्शों की गलियों में असहिष्णुता का दीमक लग चुका है। धर्म, समुदाय, जातपात ने समाज़ और सरकार पर अपनी पकङ़ मज़बूत कर ली है! यह हम सभी के लिए यह सोचने का विषय है! हाँ उसकी सुनामी आयी और नुकसान गंगा का हो गया! हाँ वो लहरें आयी और गंगा के बेटों को हिलोर गयी! हाँ जिसे गंगा ने बुलाया था, उसकी ख़ामोशी का राज हो गया! पर यह तो महादेव की नगरी है जहाँ हर घर में गंगा है! गंगा के तथाकथित बुलावे पर ऐतिहासिक जनादेश के इस फलादेश पर गंगा के घाट हतप्रभ है! काशी की गलियाँ सन्न हैं! गोदौलिया और महादेव अवाक हैं। काशी का सौंदर्य उसके वारिसों की अनुपस्थिति में निखारने का षड्यंत्र अब आकार ले रहा है। स्वतंत्र भारत में गंगा अपने परिवार सहित परतंत्र है! गंगा की मनचाही परिभाषाएं गढ़ी जा रहीं हैं। गंगा की अविरलता के दोषियों पर ख़ामोशी ! गंगा में प्रदूषण के अपराधियों पर सन्नाटा। गंगा के भ्रष्टाचारियों पर मौन! और गंगा के निरीह बेटों पर संगीन मुकदमा! यह गंगा का हित नहीं, गंगा का द्रोह है। उस गंगा का जो राष्ट्रीय नदी भी है।
महादेव की मोक्ष नगरी काशी, जहाँ पंचक्रोशी यात्रा करने से जीवन के पाप मिट जाते हैं, वहीं काशी विश्वनाथ के नेतृत्व की प्रतिकार यात्रियों को एक बड़े षड्यंत्र के तहत अपराधी बना, गंगा के बेटों को गंगा का द्रोही बना दिया गया। पुण्य के रस्ते पर पाप बोया गया। गंगा के रास्ते पर कांटे बोये गए। गंगा को यह कैसा नमन! संतो के सविनय अहिंसा प्रतिकार यात्रा में अप्रत्याशित बवाल किया गया। धर्म भीरु गंगा संतानों पर भारी हमला किया गया। और दोष गंगा की संतानो पर ही मढ़ा गया। नागरिकों के मानवाधिकार को ताक पर रख दिया गया। जो लोकतंत्र के उपासक हैं, उन्हें लोकद्रोह की संगीन धाराओं में पाबंद किया गया। इस क्रूर दमन चक्र में निरपराध गंगा-संतानों, महात्माओं, नागरिकों, सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, लेखकों, वकीलों व डाक्टरों, अध्यापकों, आदि को संगीन धाराओं में पाबंद किया गया। नागरिकों के मानवाधिकार को ताक पर रख दिया गया। हम तो गंगा की अविरलता लेने निकले थे और सिस्टम ने अपराधी बना दिया। बिन अपराध जेल-बेल का खेल खेलकर मानसिक उत्पीड़न किया गया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के देश के प्राचीनतम नगर काशी में आपातकाल लागू है। बात गंगा की है! गंगा के संविधान की है! गंगा के सवालों पर व्यापक सोच व चिंतन ही गंगा की आजादी की लड़ाई का सही मूल्यांकन कर सकेगा। एक अंतहीन सन्नाटे का प्रशांत शोर गंगा की लहरों में हिलोर ले रही है। काशी के उजालों के कोलाहल में गंगापुत्रों की पीड़ा कहीं दब न जाये। पीड़ा यह यह भँवर गंगा के सवालों में कहीं डूब न जाय। गंगा की संतानो को उदबास कर गंगा की घाटी में मेहमान महाजन अब काबिज होने को मचल रहा है। पर उसे नहीं पता की नदियों का योद्धा होना और गंगा की संतान होने में बुनियादी फरक है। गंगा ने क्या इसीलिए बुलाया था, कि ‘गंगा के बेटों’ को काशी निकाला दे कर, खुद ‘टेम्स नदी’ की सैर करी जाय। ब्रितानिया सरकार ने तो माँ भारती के बेटों को भी राष्ट्रद्रोही घोषित किया था, जिनके बलिदानों पर आधुनिक भारत खड़ा हो गया। अब गंगा के बेटों को गंगा का द्रोही घोषित किया गया है। संविधान हमें मौलिक अधिकार देता है। अनुच्छेद 25 हमें धार्मिक आजादी देता है। संविधान दिवस पर बनारस का नागरिक मूल्य अवाक् है! कारण लोकतंत्र का प्रतिनिधि और गंगा का बेटा जेल में है, और शेष गंगा संतानें संगीन धाराओं की सीखचों में ! न्याय गंगा ही करेगी। हम तो सर पर कफन बांधकर गंगा की आजादी को निकल पड़े हैं!_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

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1 प्रतिक्रिया

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jlsingh के द्वारा
November 30, 2015

पढ़कर चकित हूँ आदरणीय यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी जी. मीडिया भी खामोश है. आपने तो गंगापुत्र की ब्यथा उकेर दी है . आपने बड़ी सटीक बातें लिखी है – गंगा ने क्या इसीलिए बुलाया था, कि ‘गंगा के बेटों’ को काशी निकाला दे कर, खुद ‘टेम्स नदी’ की सैर करी जाय।


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