कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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कतारों के दिन और किल्लत की रातें!

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[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी] सुन रहे हो न भारत! देश में आर्थिक आपातकाल लग गया! एक चाय वाले ने ठिठुरन भरी घनी रातों में देश भर के लाखों गरीबों, वंचितों के चूल्हे को बुझा कर भुखमरी के डिमोनेटाइजेशन भरे कोहरे में झोंक दिया है! डिमोनेटाइजेशन के सर्द सिहरन में देश भर के बदहाल, अनाथ खेतिहरों-हेल्परों, कामगारों- बुनकरों-दस्तकारों, कुल्हड़-पुरवा-बर्तन बनाने वाले कुम्हारों-दिहाड़ी-मजदूरों, घर बनाने-बसाने वाले राजगीर मिस्त्री,कंपोजिटरों-प्रूफरीडरों-हॉकरों, बढ़ई, बुनकर, कारीगरों, दफ्तरी, खोमचा-रेहड़ी-चाय वालों, पटरी व्यवसायियों, मरीजों, फलवालों, सब्जीवालों, दूधवालों को एक अंतहीन भुखमरी के मुहाने पर खड़ा कर दिया गया! इधर बनारस के बुनकरों का भला तो हो न सका, उधर सूरत के कपड़ा मजदूर बेबसी में अपने घर लौट रहे! नोटबंदी की क्रूर कड़की में बेबस समूचा कामगार भारत सपरिवार उपवास कर रहा! माई के चोरौधा में सेंध लग गयी! मलकिन की हाँडी हेरा गयी! किसान कक्का के फाँड़ से रुपया सरक गया! खेत-खलिहान परती के मुहाने पर! रसोई के चूल्हे चिटक रहे! माँ अन्नपूर्णा पहले ही रसोईं के द्वार पर ठिठकी खड़ी थीं, अब माता लक्ष्मी भी तिजोरी से फिसल गयीं!
एक चाय वाले ने अपनी विरासत अटल जी और स्वयं को लुटेरा कहा है! (1947 से 2017 में अभी 9 महीने बाकी है 70 बरस में)! एक फकीर, एक कर्णप्रिय, अच्छी हिंदी बोलने वाले प्रखर पहरुवा वक्ता ने देश के हिंदीकारों, कवियों, साहित्यकारों, पत्रकारों को नोटबंदी के डिमोनेटाइजेशन में अपनी भूख चबाने और प्यास निगल, गरीबी ओढ़ कर ठिठुरने को बाध्य कर दिया है! शहर में नोटबंदी की बदहाली से ठीठुरता भूखा जीवन ठण्ड में अपने गरीबी के गाँव वापसी को मजबूर एक अंतहीन निहंगई के आक्रोश में तो है, जो जनाक्रोश में तब्दील हो, चिंगारियों के ज्वालामुखी की तरह भभक रहा, जिसको थाम लेना अब बस में नहीं। लम्हों की खता का सदियों ने सजा भुगता! यह भारतीय अभिलेख है, जिन्हें आंखे मूँद लेने से बरगलाया नहीं जा सकता! सरकार ने कहा नोटबंदी से देश की महँगाई दर घटी! फिर डिमोनेटाइजेशन में मयस्सर को मुहताज निवाले इतने महँगे, दूभर क्यूँ! जिस समाज में मरीज एक अंतहीन ग्राहक हो, नोटबंदी वहाँ नागरिक उपहास है!
कैश लेस इकोनामी एक अंतहीन प्लास्टिक प्रदूषण है और रुपया एक किसान की फसल! सूत के हथकरघे पहले से ठप्प थे ही,नोटबंदी में बेचारे लीलेन और टेरीकाट के बने पुराने नोट भी डिमोनेटाइजेशन की कौड़ी हो गए। अब कैशलेस उधार-विहीन प्लास्टिक मनी का निष्ठुर युग आरम्भ हो रहा! जिस देश में आज भी आस्था पवित्र नदियों में रुपये पैसे ट्रेनों से उछाल कर फेंकती हो! वहाँ प्लास्टिक करेंसी का प्रदूषण गंगा में डालने को बाध्य कर दिया गया, जिस गंगा में मूर्तिविसर्जन पर आपराधिक मुकदमें फिक्स होते हैं!
अमीरों ने सोने की कलम से हमेशा देशभक्त गरीबों के लहू को स्याही बनाकर उनकी तक़दीरें अपने नाम लिखी। चाहे मुट्ठी भर अनाज हो या हथेली भर रुपया! मुट्ठी भर पहरुवों ने नागरिकों के उन्मादी जेहन के जोर पर इस देश पर गुलामी थोपी थी, गरीबों का कोई माई-बाप नहीं! यह सच है देश एक बड़े भुखमरी के मुहाने पर खड़ा है! पहले जेब हिलोर कंगाल किया,अब सोन-चेन पर हाँथ डाल दिया! जिस देश में पचास हजार रुपये भरी से भी महँगा सोना हो, वहाँ ढ़ाई लाख में शादी! इससे बड़ा नागरिक उपहास और क्या हो सकता है भला! 5 थान गहना-जेवर, बारातियों-घरातियों का स्वागत-भोजन, टैंट-पताई, आदि सब ढ़ाई लाख रुपये में, काश नोटबंदी सरकार के पास परिवार होता!
लगता है नोटबंदी सरकार पर कलियुग का डिमोनेटाइजेशन सवार हो गया है! बीते 70 वर्षों में पहली बार किसी ने नोट के नाम पर नागरिकों का नोटा पकड़ा है! बीते सत्तर बरस न होते तो आज भी बटलर होते हम सभी! अतीत को तो लावारिस भी नहीं उदबासते! सही हो अथवा गलत, यह कहने का हक़ लोकतंत्र सरकार को कत्तई नहीं देता! डा.मनमोहन सिंह, नोबेल अमर्त्य सेन, श्री रघुराम राजन, श्री के सी चक्रवर्ती, जहाँ अर्थशास्त्र विश्राम करता है। सभी आज भारतीय इतिहास के नालंदा विश्वविद्यालय सरीखे ख़ारिज हो रहे! जब समय लौटेगा, तब कौटिल्य का अर्थशास्त्र जाग रहा होगा! सहूलियतें चुक चुकी होंगी! आज से पहले यह देश दुनिया के मानिंद अर्थशास्त्री चलाते थे, जबकि आज जाने-माने मुनीम रोजनामचा और नागरिक बही-खाता लिख रहे!
जिन उँगलियों ने जनादेश की लहरों पर उछाला, आज मझधार में उन्ही उँगलियों पर अपनी ही गाढ़ी कमाई चुराने का इल्जाम रच-लिख रहे! जिसे असीमित जनादेश ने संसद में भेजा, वह सड़क पर यायावर फिर रहा, और जिसे वो तरजीह नहीं देते वह दुर्दिन में सवा अरब लोगों के साथ Q में खड़ा है! नोटबंदी पर लाईन में खड़े 100 मासूम राष्ट्रभक्त नागरिकों के मौत का कलंक है! नोटबंदी की यह कैसी देशभक्ति, कि लाइन में खड़े 100 से अधिक नागरिक मौत को शहादत का नाम तक मयस्सर नहीं! बदहाल परिवार को मुआवजे की फूटी कौड़ी तक नहीं! मानवाधिकार आयोग भी एक चुप, हजार चुप! इंसानियत पर सियासत अपने दांव खेल रही!
नोटबंदी की डिमोनेटाइजेशन में आहिस्ता-आहिस्ता देश संवैधानिक संकट की ओर बढ़ चुका है! इधर डाँड़-मेंड़ कैशलेस हो ओदर गए हैं जिसे समथर करने के लिए इंसानियत को विरासतों की वसीयतों का हल चलाना होगा! कैसा है यह सहमा हुवा भगवान जो बेबस भक्तों पर दुर्दिन थोपकर लिहाड़ी ले रहा! प्रधानमंत्री जनता नहीं, संसद और संसद प्रधानमंत्री नहीं जनता के प्रति जवाबदेह है! नोटबंदी डिमोनेटाइजेशन पर मतदान यदि हुवा तो सदन में सरकार, ‘पार्टी’ निश्चित ही हार और ‘भारतीय जनता’ जीत जाएगी। नोटबंदी की लाइन में अनुत्तरित खड़ा नागरिक! हतप्रभ चारो स्तम्भ है! संसद भी सत्र में है! हाजिर होकर नियम 56 के तहत चर्चा कर वोटिंग करा लीजिये! सरकार अल्पमत में सरक जाएगी!
अच्छे दिन, तुम जनादेश की सुनामी लहरों पर सवार हो,समुद्र में ईमान की नाव नहीं चला रहे! जब सत्ता के समर्थक उलजूलूल बोले और विपक्ष हैक होकर सन्न हो जाये, तब रेगिस्तान के बियाबान बंजर में रेत के कच्चे घरौंदे विकास के अच्छे दिन बनकर उभरते हैं! किल्लत के रेतीले तूफान में मेरा भारत भूखा-प्यासा-ठप्प थोपी गयी लाईन में खड़ा है! मैं बात हारे-गाढ़े के अपने रुपये की कर रहा और वह नेतागिरी की चवन्नी खनखना रहे! जय हिन्द का नागरिक बिन राशन-रुपये की कृत्रिम किल्लत-कंगाली से दो-दो हाथ कर रहे देश के वित्तसेनानी, बैंक कर्मचारी की, ईमान-परस्ती भी कटघरे में? सवालों के भँवर से हाजिर-जवाबी उबर जाये यह जरुरी नहीं!
किसी भी पूर्व प्रधानमंत्री को तुच्छ घोषित करना लम्पट-लफंगई है! नोटबंदी में आज लाखों राणाप्रताप अपने चेतक को साथ लिए डिमोनेटाइजेशन लाईन में भूखे बेबस खड़े हैं! घास की रोटी भी मुफ्त में नहीं खा सकने का मलाल लिए! मैं जनपथ का एक आदमी, लाईन में खड़े होसा-झांसी के ढाई बरस बीत गए, जब बारी मेरी आई तो मेरा रुपिया चुक गया! देशप्रेम तीनटप्पा का खेल नहीं कि चिब्भा चटकाने वाले को हिमीच के देशद्रोह दे मारो! [यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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