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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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आधी आबादी की संवेदनाओँ का चीरहरण“Jagran Junction Forum”

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19_YATINDRA jpeg [यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_इंसानो के गुनाह जानवरों की तरह होने लगे तो फिर मानवीय जज्बात का रैन बसेरा कहाँ होगा। सवाल संवेदनाओं के हनन का है, जिसपर देश की नजर है। ऐसे सवाल राष्ट्रीय होते हैं और जिनके घर की महिलाये जब तक घर से बाहर रहती हैं, तब तक एक अपडर उससे उलझा रहता है। जनता ऐसे प्रश्नों से सहम जाती है। आम आदमी का कोई माई-बाप नहीं है यहाँ। जनहित का अपराधी स्वयं अपना पञ्च-परमेश्वर नहीं हो सकता।

तरुण तेजपाल ने किसी राजनीतिक दल पर नहीं आधी आबादी की अस्मिता पर हाँथ डाला है। इस प्रकरण में जो राजनीतिक दल न तीन में है न तेरह में, अनायास संवेदनाओं की तीस को नमक छिड़क रही है। गुनाह को दलगत बनाना संवेदनाओँ का चीरहरण है। सवाल आधी आबादी के साथ-साथ सामाजिक जान-माल की सुरक्षा का भी है, दलगत नहीं।

प्रत्येक दूसरों के गुनाहों पर तहलका मचाने वाले तरुण तेजपाल असल में स्वयं गुनाहों के चरित्रहीन देवता निकले। खोजी संपादक तरुण तेजपाल को पुलिस खोजे यह तहलका ही है। तरुण का तेज अब टीम तहलका भी नहीं पाल सकती। समूचा देश गलत और टीम तहलका सही कैसे? तरुण तेजपाल आगे आगे सिस्टम पीछे पीछे। यह सिस्टम की एक समस्या है जहां शिकंजा धीरे धीरे ही कसा जाता है भले ही इस सुस्ती में अपराधी ढील पा जाये पर कानून की नजर से दूर नहीं जा सकता। जज्बात और रिश्तों के बीच न्याय प्राकृतिक भी लगाना चाहिए।जब तक दूसरों के गुनाहों पर तहलका मचाने वाले स्वयं गुनाहों का देवता रहेंगे तब तक मीडिया के ईमान पर प्रश्न भी लगते रहेंगे। ईमान की महापंचायत में मीडिया की कथनी और करनी में फर्क अवाम को भी महसूस हो रहा है। चरित्र का ईमान सर्वोपरी है।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sunita dohare sub editor के द्वारा
December 1, 2013

तरुण तेजपाल ने किसी राजनीतिक दल पर नहीं आधी आबादी की अस्मिता पर हाँथ डाला है। इस प्रकरण में जो राजनीतिक दल न तीन में है न तेरह में, अनायास संवेदनाओं की तीस को नमक छिड़क रही है। गुनाह को दलगत बनाना संवेदनाओँ का चीरहरण है।……….सादर नमन …..

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 1, 2013

    आदरणीय sunita dohare sub editor जी, सादर अभिवादन, आपकी शुभकामनाओं कि अनुपस्तिथि अखरती है, मिल गयी तो शब्द को सुकून मिल जाता है, सादर, आपका ही ।

jlsingh के द्वारा
December 1, 2013

जब तक दूसरों के गुनाहों पर तहलका मचाने वाले स्वयं गुनाहों का देवता रहेंगे तब तक मीडिया के ईमान पर प्रश्न भी लगते रहेंगे। ईमान की महापंचायत में मीडिया की कथनी और करनी में फर्क अवाम को भी महसूस हो रहा है। चरित्र का ईमान सर्वोपरी है। बिलकुल सही कहा आपने आदरणीय यतीन्द्र नाथा जी!

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 1, 2013

    आदरणीय जवाहर लाल जी, सादर अभिवादन, आपकी शुभकामनाओं कि अनुपस्तिथि अखरती है, मिल गयी तो शब्द को सुकून मिल जाता है, सादर, आपका ही ।


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