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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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बदहाल बनारस:‘ब्रांड काशी’: रेहन पर घाट “Jagran Junction Forum”

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15_YATINDRA jpeg [यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_बीते 100 दिनों में वर्ल्ड हेरिटेज शहर का दर्जा तो नहीं, हाँ, महादेव की धरोहर नगरी काशी का ‘बौद्ध संस्करण’ ‘क्योटो’ जरूर बनेगा हमारा बनारस!

दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित नगर बनारस और इसकी जनता बुनियादी समस्याओं से तार-तार हो रही है। भगवान शंकर के त्रिशूल पर टिकी काशी, सनातनी ‘अविमुक्त क्षेत्र’ के साथ आस्थावानों के लिए ‘सर्वोत्तम मृत्यु’ और ‘मोक्ष’ के नगर की बजबजाती गलियाँ सहमी हुवी हैं,मणिकर्णिका और हरिश्‍चंद्र घाट के तट पर धरती की सबसे बड़ी शमशान भूमि स्वयं पर ठिठक रही है। भगवान बुद्ध की उपदेश-स्थली-बुद्ध का बदहाल बनारस, आदि शंकराचार्य की अध्यात्म-नगरी, रामानुज, वल्लभाचार्य, गुरु नानक, तुलसी की तपस्थली, चैतन्य महाप्रभु आदि अनेक संतों की कर्मभूमि-काशी, गुरुरामदास का मानव-अध्यात्म स्थल, कबीर के लिए उलटबांसियों और उजड़े ताने-बाने का झीना शहर, संत रविदास की प्रयोग-भूमि, मिर्ज़ा ग़ालिब का ‘चिराग़-ए-दहर’, पंडित मदन मोहन मालवीय की ‘सर्वविद्या की राजधानी’, डियाना एक्कके लिए ‘सिटी आॅफ लाइट’, नज़ीर बनारसी का ‘गंगो-जमुन’ का शहर बनारस आज अपनी हैरिटेज मान्यता को तरस रहा है। बनारस पिछड़-बिछुड़ गया है अपनी बुनियादी तरक्की से। मानव और सामाजिक विकास में पिछड़ चुका व्याकुल बनारस अपने हक़ से वंचित है। रोती हुवी गलियाँ, पीने का साफ़ पानी और बिजली की किल्लत के बीच बेहतर स्वास्थ्य़ सुविधाओं और इंतजाम से जूझता बनारस बहदाल सड़कों पर ठहर चुका है। हज़ारों साल से उत्तर भारत का धार्मिक-सांस्कृतिक केन्द्र,वेद, पुराण, रामायण, महाभारत में वर्णित संस्कृतनिष्ठ बनारस में हिन्दुस्तानी संगीत का बनारसी घराना भी अपनी ही शैली में डगमग क़दमों पर खड़ा है।

लगभग 23,000 मंदिरों वाले बाबा विश्वनाथ की मोक्ष नगरी काशी, पावन गंगा के सदियों पुराने तट, काल-महाकाल का धार्मिक शहर बनारस, जहाँ एक ओर ‘अल्लाह ओ अकबर’ तो एक ओर ‘हर-हर महादेव’,एक तरफ ‘अप्प दीपो भव’ तो एक तरफ ‘जय जिनेन्द्र’ एक साथ गुंजायमान रहते हैं। धरती के इतिहास के प्राथमिक पन्नों की गवाही देता, दुनिया को धर्म का पाठ पढ़ाने वाला, आज का सड़क पर बिखरा हुवा बौद्धिक शहर बनारस है, जहाँ तक तरक्की की सड़क नहीं आती।

भारत की आत्मा बनारस के विकास का पहिया रेल कारखाना, कैंट स्टेशन, एयरपोर्ट, बाटलिंग प्लांट से आगे नहीं बढ़ा, और यह भी पिछली पीढ़ी की वसीयत है। आज की पीढ़ी वाली लगातार 25 वर्षों से मेयर, 90 में से 25 सभासद,5 में से 3 विधायकों का गढ़,18 वर्षों [23-5] से संसदीय जिम्मेदारियों के बाद भी बनारस को भाजपा ने मूलभूत सुविधाओं से वंचित कर दिया है। 80 घाटों, 30 नालों, 3 ट्रीटमेंट प्लांट, वाला शहर बनारस प्यास से तड़प रहा है। छत विहीन दो महाशमशान पर कोई बुनियादी सुविधा नहीं है। तरस गया है बनारस अपने सम्मान को। रेहन पर बनारस है, ब्याज में तरक्की लेने फिर उसका महाजन घूम रहा है।

बीते 100 दिनों में अच्छे दिनों की लालसा भरी थकान के बाद, यहां गरीब तो अपनी गरीबी बिछाकर, दिन-भर की भूख लिए, महंगाई की चादर ओढ़कर ही सोया हर रात। प्रधानमंत्रीजी के संसदीय क्षेत्र बनारस में जनता बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। पानी-बिजली-सड़क को तरस रहा बेचैन बनारस, अन्तहीन मलीन गलियाँ, प्रदूषित गंगा, काशी का धर्मजीवी और परंपरागत हिंदू कर्मकांडी आर्थिक तंगी से बदहाल हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत खस्ताहाल है। बुनकर मुश्किल जिंदगी के साथ बेगार है। भूखा साहित्यकार है। बीते 100 दिनों में सरकार ने अमीरों के सपनों पर गरीबों को बेंच दिया। छली गयी जनता हाँथ मल रही है। भरोसे के अन्तःपुर में धोखों के घरौंदें हैं। एक नागरिक एक नेता पर भरोसा करना चाहता है, यह बात अलग है कि नेता नागरिक पर यकीन नहीं कर रहा। जनहित के द्यूत में जनता तो पासा है। दाँव पर लोकहित है। जनाकांक्षाओं के मेले में चेहरों का बाजार लगा है, कोई अपनों में हिल-मिल रहा तो कोई दूर देश का वासी है। वंचित तो बनारस का बाशिंदा है।

महामंत्रों के महानगर में नमो मंत्र पसर रहा है। जनभावनाओं की सनातन नगरी काशी और राजनीतिक लालसाओं का काबा बनारस, राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार हो अपनी दुर्दशा से तड़प रहा एक रुका हुवा शहर है भारत का। धार्मिक भावनाओं की खड़ी फसल काटने वाली ताकतें फिर से काशी की भावनात्मक फसल उतारने की बाट जोह रहे हैं। रुका हुवा बनारस धार्मिक ब्याज भरता ही जा रहा है। ‘पीएम-सीएम-डीएम’ इन तीन के भरोसे पर अवाम की बुनियाद टिकी है। इन तीनों में वैमनस्य नागरीक मूल्यों की अवहेलना है। बीते 100 दिन में ही समूची भाजपा ने व्यक्तिवाद का आवरण ओढ़ लिया। अब भाजपा श्री नरेंद्र मोदी से शुरू होकर श्री अमित शाह तक सिमट गयी। जनादेश तो वादों के गलियारे से ही निकलता है। इरादों की गवाही में ही नागरिक जनादेश बांटता है। जबकि सरकार जनता के इरादों को पावर का ऐनक बाँट रही है। महंगाई, भष्टाचार रोकने और बेरोजगारी पर सन्नाटा है भाजपा खेमे में। महंगाई नेस्तनाबूत हो ऐसा क्या करने वाले हैं? सवाल इरादों का नहीं सवा सौ करोड़ भारतीयों के सपनों का। सवा सौ करोड़ इरादे अपने हितों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, और बदइरादे उड़ान भर रहे है। वादेदार ही वादा खिलाफी करता है। वादों की रेल में सवारी डब्बा नदारत है।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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