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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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नेहरू युग : आजाद भारत का स्वर्णकाल

Posted On: 16 Nov, 2014 social issues,Junction Forum,Celebrity Writer में

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[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_”मोदी विजन” ने तो ‘पटेल-विजन’,'बापू-विजन’,'नेहरू-विजन’,'गांधी-विजन’ का “श्वेत-आवरण” ओढ़ लिया, और ”विजन-भगवा” इतिहास पर ‘ईस्टमैन कलर’ चढ़ा रहा है। पंडित नेहरु की समाधि ‘शांति-वन’ पर समूची भाजपा के साथ अनुपस्थित, भारत सरकार ने 20 करोड़ रुपये खर्च कर, पंडित नेहरू के सामानांतर परस्पर पंडित नेहरू का प्रतीक खड़ा कर के आधा-तिहा श्रद्धांजलि से स्वाधीनता आंदोलन की बुनियाद को ठेस दिया है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के आजाद होने के बाद शिक्षा, सामाजिक सुधार, आर्थिक क्षेत्र, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीतियों और औद्योगीकरण सहित कई क्षेत्रों में एक नयी क्रांति का सूत्रपात किया, जो आज भी प्रासंगिक बनी हुई है। वे एक ऐसे युगद्रष्टा थे जिन्होंने आने वाले समय की पदचाप को सुना और शायद यही वजह है कि उन्होंने न केवल आईआईटी, आईआईएम और विश्वविद्यालयों की स्थापना की बल्कि देश में उद्योग धंधों की भी शुरूआत की। पंडित जवाहरलाल नेहरू इन उद्योगों को देश के आधुनिक मंदिर मानते थे।

आजादी की कठोर लड़ाई के बाद स्वतंत्र भारत को सम्भालना भी एक जंग से कम नहीं था। आजादी के बाद विभाजन की आंधी से लड़ने के लिए काफी मशक्कत की जरूरत थी, और इस दौर में भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने हार न मानते हुवे सरकार सँभालने में अहम भूमिका निभाई। ऐसे ही नेताओं में स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री, एक अहम स्वतंत्रता सेनानी और आधुनिक भारत के शिल्पकार जन-नायक पंडित जवाहरलाल नेहरु थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने न केवल देश के स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी सक्रीय भूमिका निभाई बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी देश का नेतृत्व करते हुवे इसे विकास पथ पर ‘आराम हराम है’ के नेतृत्व में ‘सूई से लेकर जहाज तक’ आत्म निर्भर किया। आतंक की सदियाँ चीरकर सत्य, अहिंसा, धर्म की रोशनी में आज के सुदृढ़ भारत के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू के पदचन्हों पर खड़ा भारत वैश्विक तरक्की की साख है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसदीय जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय एवं गुटनिरपेक्षता की नींव रखी थी। भारत के आजाद होने से पहले ही कांग्रेस पार्टी ने 1925 में विदेशी मामलों की एक इकाई बनायी, जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। उसी समय उन्होंने औपनिवेशिक देशों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास शुरू कर दिया जिसमें वह काफी हद तक सफल भी रहे। ‘हमारी विदेश नीति का मूलाधार आज भी नेहरू का दिया हुआ ही है। समय के साथ विदेश नीति में बदलाव तो होता रहता है लेकिन बुनियादी अवधारणा में आज भी कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है। आजादी के समय की तत्कालीन परिस्थितियों को भांपते हुए नेहरू ने गुटनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया। दो ध्रुवीय शक्तिशाली गुटों के बीच संतुलन बनाने की उसी नीति पर भारत आज भी खड़ा है हालांकि आज दुनिया में एकमात्र महाशक्ति बची हुई है। इसका यह मतलब नहीं है कि भारत किसी खास देश से संबंध रखेगा या अमुक देश से नहीं रखेगा। गुटनिरपेक्षता का मतलब यह है कि भारत किसी भी गुट की नीतियों का समर्थन नहीं करेगा और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बरकरार रखेगा।

अवसान की आधी सदी बाद नेहरू की प्रासंगिकता फिर चर्चा में है, क्योंकि उन्हीं की बनाई आर्थिक संस्थाओं ने देश को 2008 में आई वैश्विक मंदी की आंच उस प्रकार महसूस नहीं होने दी, जैसी कुछ अन्य देशों ने झेली। देश के पहले प्रधानमंत्री की 125वीं जयंती के मौके पर उनके बेजोड़ व्यक्तित्व और करिश्माई कृतित्व पंडित जवाहरलाल नेहरु बहुमुखी व्यक्तित्व भरे, एक स्वप्नदृष्टा जिनकी लेखनी के झकझोर देने वाले रूपक, नीतियों में भारत के दूरगामी विकास के बीज रहे, देश के बुनियादी ढांचे ने उसी से आकार लिया है।

पंडित जवाहरलाल नेहरु पवित्र गंगा की लहरों और धवलता से प्रेरणा लेते थे, उनके ये शब्द आज भी जिन्दा है__“गंगा तो विशेषकर भारत की नदी है, जनता की प्रिय है, जिससे लिपटी हुवी है, भारत की जातीय स्मृतियाँ, उसकी आशाएं और उसके भय, उसके विजयगान, उनकी विजय और पराजय। गंगा तो भारत की प्राचीन सभ्यता की प्रतीक रही है। निशान रही है, सदा बदलती, सदा बहती, फिर वही गंगा की गंगा। यही गंगा मेरे लिए निशानी है भारत की प्राचीनता की, यादगार की जो बहती आयी है वर्तमान तक और बह्ती चली जारही है भविष्य के महासागर की ओर।”

किसी भी व्यक्ति की देशभक्ति का अनुमान उसके मन से लगाया जा सकता है। यदि कोई मरने के बाद भी देश के जर्रे-जर्रे में समां जाने की इच्छा रखता है, तो उसके बारे में निःसंदेह ही कहा जा सकता है कि उस व्यक्ति में महान देश-भक्त आत्मा रही। उनके देशप्रेम को उनकी आत्मकथा के इन शब्दों से टटोला जा सकता है। उन्होंने लिखा था-”मैं चाहता हूँ कि मेरी भस्म का शेष भाग उन खेतों में बिखेर दिया जाय, जहाँ भारत के किसान कड़ी मेहनत करते हैं, ताकि वह भारत की धूल और मिट्टी में मिलकर भारत का अभिन्न अंग बन जाए।”_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
November 17, 2014

सहमत!

Shobha के द्वारा
November 17, 2014

श्री चतुर्वेदी जी नेहरू जी पर बहुत सुंदर विचार हम नेहरू जी को आज के हिसाब से देखते हैं नेहरू जी जिस समय थे देश की क्या हालत थी और आज देखिये कितना सम्पन्न भारत हैं इतने भ्र्ष्टाचार के बाद भी खड़ा है डॉ शोभा


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