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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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संघर्ष बुनता छात्र

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_छात्र-दमन बर्दाश्त नहीं। लोकतांत्रिक संघर्षो पर छात्रों की मांगें जायज, दमन नासमझी है। बनारस में छात्र-नेताओं पर हुए लाठी चार्ज की निंदा। दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई की मांग।……एक तरफ बनारस के सांसद और भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी परदेस में पराये लोगों को भारत बुलाकर यहां की नर्सरी में पढ़ने का प्रलोभन बाँट रहे थे और इधर उन्ही के संसदीय क्षेत्र बनारस में भारत का संचार-सक्षम मेधावी युवा पुलिस से पिट रहा था। आस्ट्रेलिया गए पिछले दिनों भारतीय छात्रों पर अपमान भरे नस्लीय और रंगभेदीय अपराध पर भारतीय प्रधानमंत्री की ख़ामोशी से सवा सौ करोड़ पार-देशीय कदमों के प्रति संवेदनहीनता का दंश अभी ठिठका ही था कि बनारस में छात्रों के उभार, प्रतिवाद के अधिकार को कुचल देने की हताश कोशिश में अविवेकपूर्ण हिंसा का सहारा लेकर सरकार निरंकुश और बर्बर दमन का आत्मघाती कदम उठा बैठी।
निष्क्रियता के एक लंबे दौर के बाद, छात्रों के विभिन्न तबकों ने अब एक बार फिर से संघर्ष के मैदान में उतरना शुरू कर दिया है। अभीतक इसकी रफ्तार धीमी है लेकिन छात्रों के विभिन्न तबकों ने खुद को स्थापित पार्टियों से अलग करते हुए अब स्वतंत्र तौर पर इकट्ठे होना शुरू कर दिया हैं। छात्रों के विभिन्न लोकतांत्रिक तबकों के संघर्षों को एकजुट करते हुए छात्र वर्ग द्वारा उन्हें आमूल-चूल क्रांतिकारी बदलाव की दिशा में ले जाया जा सकता है जब छात्र वर्ग का अगुआ दस्ता अपनी वर्ग पार्टी के भीतर संगठित हो। मौजूदा वक्त में वह पार्टी अनुपस्थित है। लेकिन छात्रवर्ग ने निष्क्रियता के लंबे दौर से बाहर निकलना शुरू कर दिया है। छात्र शक्ति का जो विस्फोट इस बार हुआ है, वह यही नहीं रूकेगा और आने वाले दिनों में यह और ज्यादा बड़ा और व्यापक हो कर समाज के अन्य तबकों के लोकतांत्रिक संघर्षो के साथ जुड़ेगा। छात्र न सिर्फ संघर्ष के मैदान की ओर बढ़ना शुरू किए हैं बल्कि वे खुद को पुरानी, स्थापित पार्टियों से अलग कर खुद के स्वतंत्र संगठन और संघर्ष खड़े कर रहे हैं।
छात्र वर्ग ही वह अकेला वर्ग है जो तमाम संघर्षों को एकजुट व संगठित करते हुए उन्हें समाज के आमूल-चूल व क्रांतिकारी रूपांतरण की दिशा में आगे बढ़ा सकता है और उसके जरिए संघर्षकारी जनता की अंतर्निहित मांगो और आकांक्षाओं को उनकी परिणति तक पहुंचा सकता है। छात्रों या किसी अन्य तबके के लोकतांत्रिक संघर्षों के भीतर बुनियादी बदलाव या क्रांतिकारी रूपांतरण की दिशा सिर्फ छात्र वर्ग द्वारा ही जोड़ी जा सकती है और उस स्थिति में जब वर्ग संघर्ष की प्रवृत्ति मौजूद हो और छात्र वर्ग की वर्ग सचेत सेना उनकी अपनी वर्गीय पार्टी के तहत संगठित हो। ऐसा कोई प्रयास करने का अर्थ होगा समूह विशेष की राजनीति को छात्रों तक ले जाना और छात्रों को अपने-अपने समूह के संगठनों के दायरे में लाना। ऐसा कोई भी प्रयास छात्रों की मौजूदा संघर्षकारी एकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा और संघर्ष के जरिए उनके विकास की प्रक्रिया को वाधित करेगा। अलग-अलग समूहों को इस बारे में सचेत होना चाहिए और साथ ही छात्रों को भी सतर्कता बरतनी चाहिए कि ऐसे किसी प्रयास के जरिए ये समूह छात्रों की एकता में बाधा न डाल पाएं।
यह स्पष्ट है कि छात्रों के इस आंदोलन के पीछे के कारकों का असली या संपूर्ण समाधान इस व्यवस्था के भीतर संभव नहीं है। उसके लिए छात्रों को एक सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के लक्ष्य के लिए मौजूदा अलोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म करने के लिए संगठित होना होगा। अगर समूचे समाज में क्रांतिकारी संघर्ष का जोरदार प्रवाह हो रहा होता तो छात्रों के लिए इस दिशा में संगठित हो पाना संभव हो सकता था। मौजूदा समय में ऐसा कोई प्रवाह मौजूद नहीं है।
जनादेश के जादुई चिराग साहिल कर सरकार ने अपना आपा खो दिया है और वह जबरन इस देश पर इमरजेंसी थोप देना चाहती है। छात्रों की लड़ाई कारपोरेटपरस्त नीतियों को बदल देने की लड़ाई होती है और जनहित के आंदोलनों के प्रति दमन का रवैया अपनाने वाली सरकारों के खिलाफ व्यापक छात्र-आंदोलन खड़ा करना आज वक्त की बुनियादी मांग है। लोकतंत्र और संवैधानिक स्वतंत्रता पर इतना बड़ा हमला करने के बाद दमनकारी कार्यवाहीयां एक सिरे से अलोकतांत्रिक हैं और इसे इस देश का छात्र-समुदाय कत्तई बर्दाश्त नहीं कर सकेगा।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
November 25, 2014

यतीन्द्र जी समाज शायद विरोधाभास की ही बानगी है . साभार


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