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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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सकते में संस्कृत

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_जिस देश की 16वीं लोकसभा में 36 सांसदों, 3 मंत्रियों [श्रीमती सुषमा स्वराज, सुश्री उमा भारती और डॉक्टर हर्षवर्धन] ने संस्कृत भाषा में शपथ ली, जहाँ ‘15 संस्कृत विश्वविद्यालय’,'13 संस्कृत अकादमियाँ’ और ‘1 संस्कृत आयोग’ हो/_और हाँ आरएसएस-प्रकल्प ‘संस्कृत-भारती’ भी हो,,फिर भी ‘सरकार’ ‘अ-संस्कृत’ है। सवा अरब में से 80 करोड़ भारतीयों द्वारा येन केन प्रकारेण संस्कारों के निर्वहन संस्कृत में ही होते है, पर आश्चर्य, जनगणना विभाग की माने तो मात्र 14,963 लोगों की मातृभाषा संस्कृत है। भारत की लुप्तप्राय भाषाओं की सुरक्षा और संरक्षण की सूची में आने के लिए 10,000 से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली की सूची में आना होगा। देश में 22 अनुसूचित और 100 गैर-अनुसूचित भाषाएं हैं। भारत में ऐसी कोई भाषा नहीं है जिसे अल्पसंख्यक भाषा कहा जाए।

देश में संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने के यूपीए सरकार के क्रमिक फैसले को केंद्र की मोदी सरकार ने जल्दीबाजी में बीच-सत्र गत 11 नवंबर 2014 को केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा छह से आठ तक, तीसरी भाषा के रूप में जर्मन की जगह संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का आदेश जारी किया था। इस फैसले से कम से कम 70 हजार विद्यार्थी आधर में लटक गए थे। बीच सत्र में संस्कृत लागू करने के सरकार के फैसले को कुछ अभिभावकों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। फिलहाल अभी संस्कृत की परीक्षा नहीं होगी। इस प्रकार केन्द्रीय विद्यालय के कक्षा छह से आठ तक के विद्यार्थी इस साल जर्मन को वैकल्पिक भाषा के रूप में चुन सकते हैं। उल्लेखनीय है कि सितंबर 2013 लखनऊ में “आधुनिक युग में संस्कृत के महत्व” पर आयोजित सेमिनार में पारित किए गए प्रस्ताव “10 वीं तक संस्कृत को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाय” के पक्ष में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री पल्लम राजू ने 6 दिसंबर, 2013, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन और राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के डाइरेक्टर को नोट भेजकर सभी सेकेंडरी स्कूलों में ऎसा करने के लिए रास्ता निकालने का निर्देश दिया था। सत्र मध्य में था अगले सत्र के लिए विषय प्रस्तावित रहा और केंद्र में सरकार बदल गयी।

भारतीय संविधान की धारा 343, धारा 348 (2) तथा 351 का सारांश यह है कि देवनागरी लिपि में लिखी और मूलत संस्कृत से अपनी पारिभाषिक शब्दावली को लेने वाली हिन्दी भारत की राजभाषा है। भारत का इतिहास अतिप्राचीन है और इतिहास का ज्ञान ग्रंथो से होता है, भाषा से होता है। आरण्यक संस्कृति से चलकर आर्यो के माध्यम से भारतीय भाषाओं की कहानी संस्कृत से ही शुरू होती है। 2000 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक का काल संस्कृत का था, हमारे वेद, पुराण, उपनिषद और पौराणिक ग्रंथ इसी काल मे संस्कृत भाषा मे लिखे गये। फिर अपभ्रंश से पालि और प्राकृत से होते हुए सन् 1000 ई. के आसपास हमारी भाषाएँ आधुनिक काल के मुहाने पर पहुँची।_सभी उच्च भाषाओं की जननी, सर्वाधिक शुद्ध, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए एक उपयुक्त भाषा (फ़ोर्ब्स पत्रिका जुलाई 1987 की एक रिपोर्ट के अनुसार) दुनिया की सबसे पुरानी उल्लिखित भाषाओं में से एक भारत की एक शास्त्रीय भाषा देववाणी संस्कृत हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की हिन्द-ईरानी शाखा की हिन्द-आर्य उपशाखा में शामिल है। यह आदिम-हिन्द-यूरोपीय भाषा से बहुत अधिक मेल खाती है। आधुनिक भारतीय भाषाएँ जैसे मैथिली, हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, उड़िया, बांग्ला, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, (नेपाली), आदि इसी से उत्पन्न हुई हैं। इन सभी भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है। संस्कृत में सनातन धर्म से संबंधित लगभग सभी धर्मग्रन्थ लिखे गये हैं। बौद्ध धर्म (विशेषकर महायान) तथा जैन धर्म के भी कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गये हैं। आज भी हिन्दू धर्म के अधिकतर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती हैं।हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में हैं। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने २ फरवरी,1786 को एशियाटिक सोसायटी, कोल्कता में कहा- “संस्कृत एक अद्भुत भाषा है। दुनिया की भाषाओँ को ११ वर्गों में बाँटा गया है–01) इंडो इरानियन- इसके भी दो उपवर्ग है – एक में इंडो-आर्यन जिसमें संस्कृत एवं इससे उद्भूत भाषाएँ हैं, दूसरे वर्ग में ईरानी भाषा जिसमें अवेस्तन, पारसी एवं पश्तो भाषाएँ आती हैं।02) बाल्टिक : इसमें लुथी अवेस्तन लेटवियन आदि भाषाएँ आती हैं। 03) स्लैविक : इसमें रसियन, पोलिश, सर्वोकोशिया, आदि भाषाएँ सम्मिलित हैं।04) अमैनियम : इसके अंतर्गत अल्बेनिया आती हैं।05) ग्रीक। 06) सेल्टिक : इसके अंतर्गत आयरिश, स्कॉटिश गेलिक, वेल्स एवं ब्रेटन भाषाएँ आती है। 07) इटालिक : इसमें लैटिन एवं इससे उत्पन्न भाषाएँ सम्मिलित हैं।08) रोमन : इटालियन, फ्रेंच, स्पेनिश, पोर्तुगीज, रोमानियन एवं अन्य भाषाएँ इसमें सम्मिलित हैं। 09) जर्मनिक : जर्मन, अंग्रेजी, डच, स्कैनडीनेवियन भाषाएँ आती है इस वर्ग में। 10) अनातोलियन : हिटीट पालैक, लाय्दियाँ, क्युनिफार्म, ल्युवियान, हाइरोग्लाफिक ल्युवियान और लायसियान। 11) लोचरीयन (टोकारिश) : इसे उत्तरी चीन में प्रयोग किया जाता है, इसकी लिपि ब्राह्मी लिपि से मिलती है। अपने देश में संस्कृत को वैदिक भाषा के रूप में विद्वानों एवं विशेषज्ञों कि भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा की तुलना में इस भाषा को महत्त्व ही नहीं दिया गया, क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को ही वरीयता दी जाती है जिसका व्यासायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्त्व तो मिला है, परन्तु कर्मकांड की वैज्ञानिकता और व्यावसायिकता की प्रतिस्पर्धा में आत्म विश्वास के अभाव से संस्कृत पिछड़ रही है।

संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है। संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यन्त प्राचीन, विशाल और विविधतापूर्ण है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान और साहित्य का खजाना है। इसके अध्ययन से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढ़ावा मिलता है। आज आवश्यकता है संस्कृत के विभिन्न आयामों पर फिर से नवीन ढंग से अनुसंधान करने की, इसके प्रति जनमानस में जागृति लाने की; क्योंकि संस्कृत हमारी संस्कृति का प्रतीक है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्त्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें पुनः शिरोधार्य करना होगा तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
December 8, 2014

चतुर्वेदी जी  अभिनंदन चारों  बेदों के  ज्ञाता  का संस्क्रत  लगाव  अभूतपुर्व  है हमैं गर्व है कि  भावों को लिपीवद्ध होने वाली प्रथम भाषा है जिसका अविष्कार मह्रर्षी पाणिनी ने शिव के तांडव और डमरु से निकले स्वरों से किया जिनका दुनियाॅ की सब भाषाओं पर प्रभाव ओम शांति शांति का आभास करता है 

rajanidurgesh के द्वारा
December 7, 2014

कर्मकांड की वैज्ञानिकता और व्यावसायिकता की प्रतिस्पर्धा में आत्म विश्वास के अभाव से संस्कृत पिछड़ रही है। आर्थिक युग में जहाँ शिक्षा का मतलब अर्थोपार्जन होता हो वहां वही शिक्षा महत्व रखता है जिससे आर्ट उपार्जन हो सके. संस्कृत से अर्थ काम लोग ही बना पाते हैं. अतः इसका अध्ययन भी काम ही लोग करना चाहते हैं. सुन्दर विश्लेषण हैं आपका. बधाई!


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