कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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श्रीमद्भगवद्‌गीता राजधर्म का विश्वग्रंथ

Posted On: 8 Dec, 2014 social issues,Celebrity Writer,Religious में

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_भगवान का पंजीकरण नहीं हो सकता! भगवान की आकाश-वाणी का राष्ट्रीयकरण नहीं होता। सूर्य किस देश की राष्ट्रिय संपत्ति है! चन्द्रमा किसकी धरोहर है! धरती की चौहद्दी बाँट चुका इंसान जल बांध रहा हैं, अग्नि पर काबिज सभ्यता आकाश को नाथ, हवा पर आधिपत्य स्थापित कर लेने को आतुर है। अपौरुषेय कहे जाने वाले आरण्यक संस्कृति के वेद-उपनिषदों को राष्ट्रीय घोषति करना अपने भगवान को पंजीकृत करना है। मानवीय सभ्यता के धरोहर ग्रन्थ “श्रीमद्भगवद्‌गीता” को इंसानी सरहदों तक सीमित करना प्रकृति को बाँध देना है। भगवान श्री राम की मर्यादा राष्ट्रीय आचरण नहीं इंसानियत का समाजीकरण है। भगवान बुद्ध का पञ्चशील राष्ट्रीय जीवन दर्शन नहीं, इंसानियत का इनसाइक्लोपीडिया है। भगवान महावीर का पाँच महाव्रत राष्ट्रीय संकल्प नहीं, इंसानियत का संकल्प है। चाणक्य का अर्थशास्त्र राष्ट्रीय वित्त-नीति नहीं, इंसानियत का राज्य-सिद्धांत है। गांधी की अहिंसा राष्ट्रीय संपत्ति नहीं, विश्व के सभी दबे-कुचलों-वंचितों का मौलिक अधिकार है। मै और हम के कर्तव्य अभिमान से उपजी अधिकारों के सदुपयोग-दुरूपयोग की सरहदी नोक पर भगवान ‘जनार्दन’ ने अपने भक्त ‘जनता’ से जो कही; वही अमरवाणी श्रीमद्भगवद्‌गीता में लिपिबद्ध हुवी। आत्मप्रवंचना और आत्मश्लाघा का रोग दुनिया-भर के देशों के साथ भारत में भी बुरी तरह से फैल गया है, जिससे बचने-उबरने का उपाय भी राष्ट्रीय धरोहर गीता में निहित है। स्वाधीनता आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया जिसमे चप्पे-चप्पे पर ‘पवित्र गीता’ जूझ रही थी। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, डा. राधाकृष्ण, विनोवा भावे, जैसे सभी राष्ट्रीय महान आत्माओं के लिए गीता सदैव भारतीय जीवन दर्शन, भारतीय जीवन पद्धति की पथ प्रदर्शिका रही है। गीता से ही मार्ग लिया करते थे राष्ट्र के लिए समर्पित राष्ट्र पुरुष लोग।

भारतीय ऋषियों ने गहन विचार-मंथन के पश्चात जिस ज्ञान-परंपरा को आत्मसात किया, उसे उन्होंने वेदों का पवित्र नाम दिया। इन्हीं पवित्र वेदों का अंतिम भाग उपनिषद कहा गया। उपनिषदों में समाहित ज्ञान मानव की बौद्धिकता की उच्चतम अवस्था है। मानवीय मूल्यों से प्राप्त बौद्धिक शक्ति बुद्धि की सीमाओं के परे मनुष्य क्या अनुभव कर सकता है उसकी एक झलक भी दिखा देता है। उसी औपनिषदीय ज्ञान को महर्षि वेदव्यास ने सामान्य जनों के लिए “पवित्र गीता” में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। वेदव्यास की महानता ही है, जो कि 11 उपनिषदों के ज्ञान को एक पुस्तक में बाँध सके और मानवता को एक आसान युक्ति से परमात्म ज्ञान का दर्शन करा सके। “पवित्र गीता” महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद है । श्रीमद्भगवद्‌गीता की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्घ है। भगवद्‌गीता हिन्दू धर्म के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है जो इंसानो की चौहद्दी की सीमा रेखा पर भगवान के श्री मुख द्वारा इंसान से कही गयी। सरहदों पर चेहरों की स्क्रूटनी का लेखा-जोखा है यह पवित्र ग्रन्थ। श्रीमद्भगवद्‌गीता में देह से अतीत आत्मा का सलीके से निरूपण कर एकेश्वरवाद, कर्म योग, ज्ञानयोग, भक्ति योग की सारगर्भित से चर्चा हुई है। जब इंसान अपने जीवन की समस्याओं में इतिहास के महानायक अर्जुन की तरह उलझकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जीवन की रणभूमि से पलायन करने का मन बना लेता है। निराशा,अनिश्चतता, हताशा, समस्याओं की सरहद पर कर्तव्य विमुख न हो सके इसी के लिए 5,151 वर्ष पूर्व कही गयी “श्रीमद्भगवद्‌गीता” के 700 श्लोकों को पढ़कर उन्हें अपने जीवन में आत्मसात करने का आह्वान सभी राष्ट्र के महापुरुषों ने अपने-अपने समय पर कहा है।

भारत सहित दुनिया के सभी प्रमुख दार्शनिकों, विचारकों, चिंतकों, संतों, विद्वानों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों अपने अपने स्तर से इस पवित्र ग्रन्थ को आत्मसात किया था। सर विलियम जोन्स (1746-1794) द्वारा “मनु-स्मृति” के अनुवाद ग्रन्थ में तत्कालीन अंग्रेज गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने इस ग्रन्थ की भूमिका में इसे ‘मानवता की उन्नति’ के लिए आवश्यक ‘एक महान मौलिक ग्रन्थ’ मानते हुवे लिखा-कि ‘गीता का उपदेश किसी भी जाति को उन्नति के शिखर पर पहुंचाने में अद्वितीय है।’(सन्दर्भ_बी.एन.पुरी ‘एन्सेट’ इंडियन हिस्ट्रोग्रेफी-ए.बाई सेन्चुरी स्टडी,’ दिल्ली 1994 पृ. 41)।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के चार्ल्स विकिंस Charles Wilkins (1749-1836) जिसने बनारस में संस्कृत भाषा सीखी, ने 1785 में भगवद्गीता का अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित किया। शायद यही पहली बार था जब संस्कृत ग्रन्थ का सीधे किसी यूरोपीय भाषा में अनुवाद हुआ। डुपरो, फ्रेंच विद्वान (1778 में) ने इसका फ्रेंच अनुवाद कर इसे ‘भोगवाद से पीड़ित पश्चिम की आत्मा को अत्यधिक शांति देने वाला’ कहा। ऑगस्त श्लेगल (१७६७-१८४५)-जर्मन दार्शनिक और विल्हेम हम्बोल्ड ने मिलकर भगवद्‌ गीता का जर्मन में भाष्य प्रकाशित किया। विल डयून्ट-अमरीकन दार्शनिक(1885 – 1981) मैजिनी-इटली, हेनरी डेविड थोरो (1813-1862), इमर्सन से लेकर वैज्ञानिक राबर्ट ओपन हीमर तक सभी गीता ज्ञान से स्तम्भित हुए। पादरी इमर्सन ने गीता अनुवाद कर इसे ‘यूनिवर्सल बाइबिल’ कहा था।16 जुलाई, 1945 को अमरीका के न्यूमैक्सिको रेगिस्तान में जब अणु बम का प्रथम परीक्षण किया गया तो वैज्ञानिक राबर्ट ओपनहाबर ने विस्फोट से अनन्त सूर्य में अनेक ज्वालाओं को देखकर उसे गीता के विराट स्वरूप का दर्शन हुआ तथा वह त्यागपत्र देकर गीता भक्त बन गया था। टी.एस. इलियट ने गीता को ‘मानव वांग्मम की अमूल्य निधि’ कहा। दुनिया की 28 सभ्यताओं के विशेषज्ञ, विद्वान, विश्वविख्यात, इतिहासकार, सर आरनोल्ड टायनवी ने यहाँ तक कहा कि-विध्वंस की ओर जाते पाश्चात्य जगत को भारतीय तत्वज्ञान की ओर जाना पड़ेगा, जो सभी के अन्दर ईश्वर की मानता है( सन्दर्भ_’ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री’)। अमरीकी विद्वान इमर्शन और इंग्लैण्ड के संत कार्लायल ने कभी परस्पर एक दूसरे को गीता भेंट किया था। शोपनहावर-जर्मनी विद्वान ने माना कि ‘भारत मानव जाति की पितृभूमि है।’ कांट-जर्मनी विद्वान के जीवन को गीता ने दर्शन का पंडित बना दिया। मैक्समूलर तो भक्ति भाव से अभिभूत थे। रोमां रोलां- फ्रेंच विद्वान,नोबुल पुरस्कार विजेता के अनुसार गीता ने यूरोप की अनेक आस्थाओं को धूल-धुसरित कर दिया तथा मानव को नवदृष्टि दी।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
December 16, 2014

आदरणीय यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी जी ! अच्छे लेख के लिए अभिनन्दन और बधाई ! बहुत सी चीजें पूरी मानव जाति के लिए होते हुए भी राष्ट्रिय महत्व और राष्ट्रिय धरोहर घोषित की जतिन हैं, उसका एक ही मकसद होता है कि उसे लम्बे समय तक के लिए सुरक्षित और महत्वपूर्ण बनाया जाये ! यदि हम किसी चीज को पहले महत्व नहीं देंगे तो दुनिया क्यों देगी ! यदि राष्ट्र, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राष्ट्रिय पक्षी और राष्ट्रिय धरोहर घोषित हो सकता है तो राष्ट्रिय ग्रन्थ क्यों नहीं घोषित हो सकता है ! प्रकृति कि बहुत सी चीजों जैसे-धरती, पानी, हवा, आकाश और अग्नि आदि भी सम्पूर्ण विश्व की धरोहर होते हुए भी किसी देश की राष्ट्रिय धरोहर भी होती हैं ! हम ये थोड़े ही कह रहे हैं कि गीता सिर्फ हमारी है, बल्कि उसे राष्ट्रिय ग्रन्थ का दर्जा देकर हम स्वयं उसे महत्व देते हुए सारे विश्व को महत्व देने के लिए प्रेरित करेंगे ! दरअसल यही मांग कांग्रेस ने कि होती तो सभी उसकी तारीफ करते ! भाजपा से एलर्जी होना ही विरोध का मुख्य कारण है !

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, भारत सहित दुनिया के सभी प्रमुख दार्शनिकों, विचारकों, चिंतकों, संतों, विद्वानों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों अपने अपने स्तर से श्रीमद्भगवद्‌गीता, इस पवित्र ग्रन्थ को आत्मसात किया था। हम भी करते हैं आप भी करते ही होंगे। __सादर

jlsingh के द्वारा
December 15, 2014

भगवान का पंजीकरण नहीं हो सकता! भगवान की आकाश-वाणी का राष्ट्रीयकरण नहीं होता। सूर्य किस देश की राष्ट्रिय संपत्ति है! चन्द्रमा किसकी धरोहर है! धरती की चौहद्दी बाँट चुका इंसान जल बांध रहा हैं, अग्नि पर काबिज सभ्यता आकाश को नाथ, हवा पर आधिपत्य स्थापित कर लेने को आतुर है। अपौरुषेय कहे जाने वाले आरण्यक संस्कृति के वेद-उपनिषदों को राष्ट्रीय घोषति करना अपने भगवान को पंजीकृत करना है। मानवीय सभ्यता के धरोहर ग्रन्थ “श्रीमद्भगवद्‌गीता” को इंसानी सरहदों तक सीमित करना प्रकृति को बाँध देना है। भगवान श्री राम की मर्यादा राष्ट्रीय आचरण नहीं इंसानियत का समाजीकरण है। – आपने काफी शोध के साथ इस आलेख को प्रस्तुत किया है. संभवत: सुषमा स्वराज भी इतना नहीं जानती होंगी उन्हें कुछ कहना थाइसलिए कह दिया. कुछ बोलीं तो सही नहीं तो आजकल उनकी आवाज कहाँ सुनाई पड़ती है. एकोअहम (मोदी) केसिवा अब भाजपा में रक्खा क्या है……? अब आडवाणी जी को भी कुछ कहना था इसलिए गीता के साथ रामायण महाभारता को भी जोड़ दिया…..

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय जवाहर भैया, आप के शब्द हमने सहेजे है। आपके दुलार हमने सुरक्षित रखे है। हर दूर रह कर भी पास पास महसूस करते हैं।__सादर

bhagwandassmendiratta के द्वारा
December 10, 2014

आदरणीय यतीन्द्र नाथ जी श्रीमद भगवद गीता पर सुविचारित एवं शोधकृत लेख लिखने के लिए धन्यवाद विशेषकर आमजन एवं राजनेताओं को एहसास दिलाना कि गीता सरीके महान ग्रंथों को किसी क्षेत्र विशेष अथवा समुदाय विशेष तक सीमित कर देना बेमानी होगा एक सफल प्रयास है आप बधाई के पात्र हैं धन्यवाद

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 10, 2014

    आभार आदरणीय bhagwandassmendiratta जी, मानवीय सभ्यता के धरोहर ग्रन्थ “श्रीमद्भगवद्‌गीता” को इंसानी सरहदों तक सीमित करना प्रकृति को बाँध देना है।

Shobha के द्वारा
December 9, 2014

श्री यतीन्द्र नाथ जी गीता सम्पूर्ण ग्रन्थ है इसको समझना भी आसान नहीं है आपने समझा इसके महत्व की विस्तृत व्याख्या की सराहनीय काम है गीता पहली बार समझ नहीं आती बार बार पढने के बाद आत्मा में उतर जाती है हो सकता है यह मेरा अनुभव हो डॉ शोभा

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 10, 2014

    आभार आदरणीय Shobha जी, श्रीमद्भगवतगीता के प्रकाश में चली धड़कनों से ईश्वर खुश होता है और आत्मा के परमात्मा में मिल जाने का रास्ता साफ़ हो जाता है

Shobha के द्वारा
December 9, 2014

श्री जितेन्द्र जी गीता सम्पूर्ण ग्रन्थ है इसको समझना भी आसान नहीं है आपने समझा इसके महत्व की विस्तृत व्याख्या की सराहनीय काम है गीता पहली बार समझ नहीं आती बार बार पढने के बाद आत्मा में उतर जाती है हो सकता है यह मेरा अनुभव हो डॉ शोभा

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 10, 2014

    आभार आदरणीय Shobha जी,

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 8, 2014

मानवीय सभ्यता के धरोहर ग्रन्थ “श्रीमद्भगवद्‌गीता” को इंसानी सरहदों तक सीमित करना प्रकृति को बाँध देना है। —–भगवत गीता  एक ऐसा ग्रन्थ है जो जीवन के उन क्षणों में साहस देता है जब सब तरफ से निराशा घेर चुकी हो ,और मनुष्य   हर देश में  हर काल में जीवन रूपी महायुद्ध में खड़ा रहता है ,तो निश्चित ही भगवत गीता को सरहदों में नहीं बाँधा जा सकता ,चाँद -सूरज की तरह –आपका आलेख बहुत उत्कृष्ट एवं ज्ञान वर्धक है आदरणीय यतीन्द्र जी ,सादर .

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 10, 2014

    आभार आदरणीय Nirmala Singh Gaur जी, प्रत्येक नागरिक को श्रीमद्भगवतगीता आत्मसात करनी चाहिए।

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
December 8, 2014

चतुर्वेदी जी गीता के अंदर क्या है उसको किसने आत्म सात किया । किंतु गीता के बाहर क्या है इस पर विस्त्रत वर्णन आपने किया है । किंतु अंदर क्या है उस पर मेरे व्यंग पर गौर करें ओम शांति शांति का आभास होगा धन्यवाद 

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 10, 2014

    आभार आदरणीय PAPI HARISHCHANDRA जी, श्री मदभगवत गीता तो हमारी जीवन मूल्यों की सरहदी मीमांसा है


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