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शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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संकट में है 'धर्म'

Posted On: 13 Dec, 2014 social issues,Celebrity Writer,Religious में

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_भटक गया है भारत! थम गया जनहित! भारत दुनिया से जीत कर भी घर के चप्पे-चप्पे पर हार रहा है। ‘सोने की चिड़िया’ था देश, जिसकी सरकार अब ‘ट्वीटर’ पर ‘चहकती’ है। ‘ट्वीटर’ पर ‘चहचहाने’ वाली यह सरकार बुनियादी मुंडेर से कतरा जाती है अकसर। धर्म की बुवाई कर परिवर्तन की फसल पकाई जा रही है। धर्म परिवर्तन की सुनामी लहरें उफन रहीं हैं। लगता है भारत का ‘मूल-धर्म’ चोरी हो गया, क्यूंकि जनहित से बड़ा ‘धर्मान्तरण’ हो गया। ‘वसुधैव-कुटुम्बकम’ के आँगन में बिलगाव पसर रहा है। ‘अहम्-ब्रम्हास्मि’ के देश में धर्म से बड़ा धर्म-परिवर्तन होगया! ‘सहनाववतु’ के देश में साथ रहने वाले किसी ख़ास अल्पसंख्या के नागरिकों के घरौंदे जलाना, उसके साथ अनीत-अन्याय करना, राष्ट्रीय धर्म होता जा रहा है! करपात्री जी महराज की भाषा में कहें तो-’धर्म की जय हो’,'अधर्म का नाश हो’, ‘प्राणियों में सद्भावना हो’, ‘विश्व का कल्याण हो’, पर विश्वगाँव की बस्ती में बसर से ज्यादा जरुरी मजहबी दीवारों की ओट में ‘घर वापसी’ हो गया। वतन से बड़ा धरम हो गया! धर्म से विरत इंसान जानवर से भी बत्तर है। धर्म का अर्थ क्या अपने से अलग विश्वास के व्यक्ति को जिंदा ना रहने देना ही है? मनुष्य के सांचे में इंसान कम कुरीतियों भरा समाज प्रचुरता से ढलने लगा। हम एक समाज हैं, जो ‘जीव-दया’ से पोषित होता है। असत्य द्वारा निर्धारित धर्म से इंसानियत गिरवी हो जाती है। अधर्म को धर्म घोषित करने से समाज मिट जाता है। महानता किसी धर्म-जाति-संप्रदाय की पंजीकृत सम्पदा नहीं, यह इंसानियत की लोकतांत्रिक बस्ती है, जो हिन्दू-मुसलिम निजता तक सीमित नहीं। ‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम’ की छाती जिस विचार धारा से छलनी हुवी, वह लोकतांत्रिक प्रतिनिधि, राष्ट्रीय महान कैसे ? आज का ‘वैष्णव जन’ अब ‘पीर पराई’ जानने से परहेज करता जा रहा है। “हे राम” के महामंत्र की चीख पर अहिंसा की टूटती साँसों पर सारी दुनिया रोई थी। भगवान राम के देश में ‘हे राम’ का उच्चारण कराने वाले लोगों ने समय-समय पर राम पर ही दांव लगाया है। धर्म अब राजनीती के गलियारे से लोभ का रूप ले रहा है। भगवान राम के एहतराम पर चोट देना दुराग्रह है। पूरी दुनिया में जिस भारतीय का नाम सबसे ज्यादा जाना जाता है और जिस एक भारतीय को पूरी दुनिया सम्मान देती है, और अपनी नई पीढ़ी को जिसके बारे में लगातार जागृत बनाए रखती है उस शख्सियत का नाम गांधी है। पर भारत में ऐसे वर्ग भी हैं जो गांधी से घृणा करती रही और आज समय के साथ बूढी हो गयी। यह सच है की विश्व गांव में गांधियन पसर रहा है और चरमपंथ सिकुड़ता जा रहा। देश भूख और प्यास के हिस्से पर गम्भीर है और ‘वो लोग’ धर्मान्तरण की क्रांति हिलोर रहे हैं।

समाज जातियों का परिसंघ है और प्रत्येक जाति अपने-अपने अहाते में बंद होकर समाज के संगठन में ‘धर्म-परिवर्तन’ करने वाले के लिए कौन सा स्थान है! कोई भी वर्ग उसे अपनी जाति में शामिल नहीं करेगा। प्रत्येक जाति में सजातीय विवाह होते हैं! समाज केवल उसी व्यक्ति को अपना सदस्य बनाता है, जो उसके भीतर पैदा होता है और बाहर के किसी व्यक्ति को अपने भीतर नहीं आने देता। समाज की एकजुटता को सशक्त करना है तो हमें उन शक्तियों से निपटना होगा, जिन पर विघटन का दायित्व है। समाज की एकजुटता के स्थान पर यदि केवल घर वापसी का सहारा लिया गया तो इससे और अधिक विघटन होगा, उससे एक समुदाय हतोत्साहित हो जाएगा और दूसरे समुदाय को कोई लाभ नहीं होगा। ‘धर्मान्तरण’ के कारण जो ऐसा व्यक्ति आएगा, वह बेघर ही रहेगा। वह अलग-थलग एकाकी जीवन ही बिताएगा और उसकी किसी के प्रति न कोई विशिष्ट निष्ठा होगी और न कोई खास लगाव होगा। जितनी अधिकता जातियों की होगी, समाज का उतना ही अधिक अलगाव और विलगाव होगा और वह उतना ही अधिक कमजोर होगा। यदि समाज जीवित रहना चाहता है तो उसे सोचना ही पड़ेगा कि वह संख्या में वृद्धि न करे, बल्कि अपनी एकात्मा में वृद्धि करे। मिशनों के निवेदन-दिवस 3 दिसंबर, 1873 को वेस्टमिन्स्टर एब्बे की ओर से महान जर्मन विद्वान और प्राच्यविद प्रोमैक्समूलर ने जो अभिभाषण दिया था, उसमें उन्होंने जोरदार शब्दों में कहा था कि हिंदू धम्र, धर्म-प्रचार करने वाला धर्म नहीं है।

त्याग का महारथी भारत निर्लोभ की अद्भुद क्षमता रखता है! दुर्दम्य आस्तिकता का संबल भी स्वतंत्र भारत में करुणांत ही सिद्ध हो रही है! समुदायों में विभक्त भयभीत समाज एकता का स्वप्न देखना बंद न कर दे! सहस्राब्दियों तक टिकी रहने वाली भारतीय संस्कृति की बुनावट में ‘बाज’ भी, गहरी करूणा के ‘जटायु’ संस्करण मिलते हैं। समय के साथ अस्वाभाविक विभाजन, जुड़ाव में परिवर्तित होकर, सत्य पुनः स्थापित हो जाता है। आज के धुंध भरे समाजीकरण में जीवन को धारण करनेवाले विशाल धर्म के शिक्षित, संयत स्वावलम्बित प्रश्नों से टकराना बड़े जोखिम का काम है। लोग साक्षार हो गये पर अधूरे, सक्षम भी हो गए पर कई तरह से विपन्न। जीवन की सुविधाओं के छूटने के डर से लोग ऐसे प्रश्नों से कतराना चाहते हैं, क्योंकि बड़े बुनियादी प्रश्नो से टकराने के लिए सुविधाएँ अपने आप खिसकने लगती हैं।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
December 20, 2014

धर्म कभी भी संकट मैं नहीं होता सर्व जन हिताय सर्व जन सुखाय ही धर्म होता है पहिले आत्मा फिर परमात्मा भी धर्म होता है अपने अपने धर्म निभाने वाला ही कर्मठ यानि कर्म योगी कहा जाता है  चिंतित ना हों चतुर्बेदी जी ओम शांति शांति लाने वाला ही धर्म होता है 

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय PAPI HARISHCHANDRA जी, हम सभी तो जिंदगी की धड़कनों में धर्म तलाशते है। प्रत्येक आने जाने वाली सांसों के मध्य को एकजुट कर धर्म और अधर्म को हंस दृष्टि प्रदान करते रहते हैं

jlsingh के द्वारा
December 14, 2014

जो घटित हो रहा है …आनेवाले समय में कुछ भी अनर्थ हो सकता है …मोदी जी अगर इन्हे नहीं सम्हाल सके तो??? लोग अग्नि में घी डालने का ही काम कर रहे हैं…विभिन्न मंचों से आप अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं. आपके साहस को नमन!

    yatindranathchaturvedi के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय जवाहर भैया, आप हौसला अफजाई बड़ी शिद्दत से करते है। मेरे शब्दों को आपका समर्थन और शुभेक्षा हासिल है। यही हमारा सम्बल है।


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