कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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उत्तिष्ठ भारत

Posted On: 1 Jan, 2015 social issues में

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_उत्तिष्ठ भारत! जिंदगी ने एक पन्ना आज फिर मुझसे पलटवाया है! मैंने बिहान लिखा है इसे सहेजे रखना! मूल्याङ्कन समाजीकरण का प्रवेशद्वार है। पर जीवन के उसूल मूल्याङ्कन से पहले जिए जाते हैं। घने अँधेरे में चरित्रवान सितारे ही चमकते हैं और दिन में भी चरित्र सूरज का धिककर सभी को उजाले की रोशनी देता है। न दिन खत्म हुवा और न रात! पर इसी के मध्य जिन्दा है सत्य जिसे हम चरित्र कहते हैं! अतीत का पुनरावलोकन, विरासतों के वसीयतनामे के आत्म-अवलोकन का महत्वपूर्ण दिवस है वर्ष का प्रथम दिन। पलों पर सवार रात और दिन, सप्ताहों के गलियारों से होता हुवा महीनों के चौड़े रास्ते से गुजर गया। एक बरस फिर से बीत गया। और नए बरस के मुहाने पर जिंदगी आकर खड़ी हो गयी। चिर पुरातन, नित नया है! हमने अबतक जो जिया वह जिंदगी से हमारा परिचय था। आज जीवन के इस पड़ाव पर अतीत हो चुके पलों को अलविदा कहना हमारी विवशता है और नये पलों का स्वागत करना हमारी स्व-विकसित परंपरा। उठ जाग मुसाफिर, भोर भई, अब रैन कहाँ, जो सोवत है!

सदियों से पुरुखों को अपने अवसर बिखेरता समयबद्ध वर्ष का प्रथम दिन आज हम तक आया है! अतीत की खुशबू में हमारी विरासतें आज लयबद्ध होकर इतिहास की धरोहर हो गयी और भविष्य के चौड़े रास्ते हमारी प्रतीक्षा में क्रमबद्ध हैं। चलना हमारा कर्म है, पहुंचना हमारा धर्म! सदियों से विरासतों के अस्तित्व पर,परम्पराओं की साख पर, दुविधाओं, बिलगावों, बुराइयों को कुचल कर, एकता की हिफाजत करता हुवा, रिश्तों के फरेब पर, भरोसे की स्थापना करता, दूर जा बस चुके अपनो के एकजुट होने की इसी ललक के साथ यह नया वर्ष-जनवरी-01,2015। बीते दिवसों की सुनहरी यादों की नींव पर नए वर्ष की रचनात्मक चुनौतियों के बीच भारत के आने वाले स्वर्ण-युगीन साम्राज्य के लिए हमें और आपको तत्पर होना है। दुनिया जहाँ आज हिन्दुतान की ओर अपने अंधेरों का सूर्योदय पाने की आशा में मुड़ने लगी है, वहीं देखते देखते भारत विश्व-शक्ति हो चला है। ऐसे समय के इतिहास बन रहे इस मोड़ पर हम समय समय का वह दस्तावेज हैं, जिनपर कल, आज और कल को वर्त्तमान बनाकर हिन्दुस्तान को खड़ा होना है। ऐसे में सदियों की थाती बटोर, भारत की एक-एक आबादी को समेत की मेहनत की कलम, पसीने की स्याही और इमान के पन्नों पर सदियों से लिखी-जाती रोटी और कलम के सपनों का साम्राज्य निर्माण करना है। इसी नए प्रशस्त वर्ष दो हजार पंद्रह के जिम्मेदारियों से ओत-प्रोत हम सभी।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
January 2, 2015

आदरणीय यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी जी ! बहुत विचारणीय लेख ! पढ़कर अच्छा लगा ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई ! नए वर्ष में भी आपकी प्रभावी लेखनी अनवरत चलती रहे !

pkdubey के द्वारा
January 2, 2015

दिव्य उद्बोधन भाईसाहब ,सादर आभार | हम समय का वह दस्तावेज हैं, जिनपर कल, आज और कल को वर्त्तमान बनाकर हिन्दुस्तान को खड़ा होना है। ऐसे में सदियों की थाती बटोर, भारत की एक-एक आबादी को समेत की मेहनत की कलम, पसीने की स्याही और इमान के पन्नों पर सदियों से लिखी-जाती रोटी और कलम के सपनों का साम्राज्य निर्माण करना है। इसी नए प्रशस्त वर्ष दो हजार पंद्रह के जिम्मेदारियों से ओत-प्रोत हम सभी।


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