कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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विश्वास की पहेली में फंसी कांग्रेस

Posted On: 14 Feb, 2015 social issues में

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15_YATINDRA jpeg [यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_सवा सौ वर्षों के भारतीय इतिहास के राजनीतिक बादशाहत के बाद कांग्रेस को खेमो के खंजर ने देश की राजधानी दिल्ली में फकीरी की ओर धकेल दिया है। जनादेश के स्पंदन में कांग्रेस की नब्ज पकड़ से बाहर हो रही है। दिल की धड़कनें मद्धम हो रही है। आवाजों के चिल्लाहट में अनसुनी बुनियादी आवाजों के दलदल में कांग्रेस धंसती जा रही है। आत्मनिरीक्षण और प्रतिबिंब के मीलों लम्बे रास्ते पर चलना पड़ेगा।

सूर्यास्त के बाद सूर्योदय, अँधेरे के बाद उजाला, असत्य के बाद सत्य की विजय, ऐसे विश्वास का नाम कांग्रेस है, जो हार और जीत दोनों में सम्यक है। इतिहास उन पराजयों का अभिनन्दन करता है , जो हार -जीत से ऊपर उठकर राष्ट्रीय मूल्यों का संघर्ष करते है।

अठारह सौ सतावन के पराजित पक्ष पर आज भी इतिहास विजेताओं के साथ नहीं, पराजित भारत के साथ खड़ा होने में गर्व का अनुभव करता है। कर्बला की लड़ाई में पराजित पक्ष पर इतिहास आज भी अपनी छाती पीटता, अश्रु बहाता किस साल नहीं मिलता! कर्बला की विजय आज भी कटघरे में है। जीत में हार और हार में जीत, यह सिलसिला ही विश्व इतिहास है।

वर्तमान जनादेश नयी दिशा की ओर अग्रसर है, जो हार और जीत के इसी सिद्धांत पर राष्ट्रिय चुनौतियों के समाधान चाहता है। यह जनादेश न किसी का विरोधी है और न किसी का समर्थक। आज विजेताओं के पास कोई कार्य सूची इतिहास को नहीं दीख रही है। जोश खूब है, किन्तु देशहित के होश जोश में खो गए हैं।

जीवन केवल प्रयोगशाला नहीं है और राष्ट्र भी कोई लेबोरेटरी नहीं, जहाँ नुस्खों की आजमाइश की जाय। प्रयोग वादियों के प्रयोग को गुण-दोष के आधार पर विश्लेषण करने का दायित्व आज कांग्रेस के कन्धों पर है, जिस आवाज को दबाने की कोशिशें आज जोरों पर है।

महात्मा गांधी के शब्दों में कहें तो उनकी बकरी भारत की बेजुबान जनता है, जिसकी जुबान गांधी खुद होने की बात करते थे।

सदियों से विरासतों के अस्तित्व और परम्पराओं की साख पर दुविधाओं, बिलगावों, बुराईयों, को कुचलकर एकता की हिफाजत करता हुवा, रिश्तों के फरेब पर भरोसे की स्थापना करता, दूर जा बस चुके अपनों के एकजुट होने की ललक है भारत का लोकपथ। आजादी के पहले से और आजादी के बाद भारत ने दिन-रात के सपने को संजोया है। भूखे-नंगे पैरों के भारत ने आज तरक्की के नए मापदंड वाले मुहाने पर खड़ा सम्मान के साथ जीना सीख लिया है। ऐसे में सदियों की थाती बटोर, भारत की एक-एक आबादी को समेटकर मेहनत की कलम, पसीने की स्याही और ईमान के पन्नों पर सदियों से लिखी जाती रोटी और कलम के सपनों का साम्राज्य निर्माण करना है। दुनिया जहां आज हिंदुस्तान की ओर अपने अंधेरों का सूर्योदय पाने की आशा में मुड़ने लगी है, वहीं देखते देखते भारत विश्वशक्ति हो चला है। ऐसे समय के इतिहास बन रहे इस मोड़ पर हम समय का वह दस्तावेज हैं, जिनपर कल, आज और कल को वर्त्तमान बनाकर हिंदुस्तान को खड़ा होना है।

हमारे पीछे एक महान विरासत है। एक ऐसी बुनियाद जिसने भारत को आजाद कराया। एक ऐसी परम्परा जिसने एक प्राचीन सभ्यता के बीच एक आधुनिक देश भारत का निर्माण किया। एक ऐसी निष्टा जिसने बीसवीं शताब्दी को कांग्रेस की शताब्दी बनाया और इक्कीसवीं शताब्दी भी तो कांग्रेस की ही शताब्दी की ओर अग्रसर है। बीसवीं सदी के पहले आधे हिस्से में कांग्रेस के ही अथक संघर्ष और युवाओं के असीम त्याग की वजह से दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य से आजादी मिली और न उगने वाला सूरज भी उगा, और अब यह भी कांग्रेस ही थी जिसने शताब्दी के दूसरे हिस्से में आजाद भारत को आधुनिकतम सम्प्रभुता संपन्न संघीय गणराज्य बनाया।

राजनीति; जिसकी प्राथमिकता भटक चुकी है। जनमानस आधारभूत सुविधाओं को बड़ी शिद्दत से मुहैया करा पाता है। रोजमर्रा के भूख का भयावह साम्राज्य फ़ैल चुका है। बेरोजगारी, चरमसीमा में है। भ्रष्टाचार से समाज पीड़ित है। अवाम नुकसान अधिक, फायदा कम की बुनियाद पर जिंदगी जीने को मजबूर है। यह नयी शुरुवात का समय है। नए संकल्प का समय है। एक ऐसा समय का जब हमें युवाओं को उसका पुराना गौरव वापस लाने, राष्ट्रीय क्षितिज में अपनी प्रमुखता स्थापित करने की शपथ लेनी है। चुनौतियां अनेक है, और बहुत बड़ी हैं। बिना विचलित हुवे उनका मुकाबला करना है। हमारे समाज के कमजोर लोग बराबरी चाहते हैं, मेहबानी नहीं।

श्री राहुल गांधी पुरुखों के त्याग, बलिदान की विरासत पर भविष्य की योजनाओं की बुनियाद रख रहे हैं। बुनियादी हालातों से वाकिफ होने और अपने संगठन को आत्मसात करने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा है। पहले सांसद बनकर उन्होंने जमीनी राजनीति की नब्ज टटोला और फिर उपाध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन को समझा। देश के आम आदमी के जीवन शैली में सुधार, राष्ट्रीय एकता, जातीय सद्भावना, शांति और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के मूलमंत्र वाले राहुल गांधी जिनके शब्द अवाम के लिए बने। जिसकी हर सांस अवाम के लिए चली। शांत और आक्रामक दोनों लहजों वाले राहुल गांधी को भविष्य की जरूरत के रूप में देखा जा रहा है। आम आदमी के आँगन में श्री राहुल गांधी का लोकतंत्र पोषित होता है। आम आदमी के सम्मान के प्रति संवेदनशील राहुल गांधी पर देश भरोसे की स्थापना करना चाहता है। अवाम की खुशहाली के साथ हर हाँथ को काम, इंसान को सम्मान की प्राथमिकता वाले राहुल गांधी देश की नब्ज हैं। देश के सबसे पुराने पहले राजनीतिक परिवार से संबंधित होने की वजह से उनके अनुभव पर शक करना पूर्णतया बेमानी है क्योंकि पृष्ठभूमि अपने आप में अनुभव प्रदान करती है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मनरेगा, सूचना का अधिकार, आदिवासी सशक्तिकरण, कृषि ऋण माफी, पारदर्शिता, विकास, शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा की उपलब्धियों में राहुल गांधी की संवेदनशील भूमिका महत्वपूर्ण है। जवाहर लाल नेहरू द्वारा ‘भारत की खोज’ के लोकतान्त्रिक विरासत में राहुल गांधी भारत की पुनर्खोज की कार्यशाला हैं।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepak pande के द्वारा
February 18, 2015

AB SAMAY आ गया है की CONGRESS अपना अहम त्याग कर एक विशुद्ध राजनीती की ओर बड़े और सबके लिए एक UDAHARAN PESH KARE

OM DIKSHIT के द्वारा
February 18, 2015

चतुर्वेदी जी,नमस्कार. आप ने सशक्त रूप में कांग्रेस को प्रस्तुत किया है.लेकिन जनता में पुनः विश्वास पैदा करना होगा.राहुल गांधी को भी अपने चिंतन और संवाद प्रक्रिया का मंथन करना होगा.जमीन और उससे जुड़े कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान देना होगा ,अपनी उपलब्धियों को समय रहते जोरदार ढंग से न प्रस्तुत कर पाने के कारण तथा अपने एवं सहयोगी दलों के मंत्रियों के बदजुबानी एवं भ्रष्टाचार के मामले हाबी हो जाने के कारण ही पराजित होना पड़ा.अब भी समय है.आगामी विधान सभाओं के चुनाव के पहले सोच,व्यवहार और प्रस्तुतीकरण में भारी परिवर्तन लाना होगा.नेता को एक ओजस्वी वक्ता भी होना चाहिए,इंदिरा जी और हेमवती नंदन बहुगुणा की तरह,न कि मनमोहन सिंह जी की तरह.


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