कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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तंगहाल नागरिक निराशा के मध्य सूट-नीलामी

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_लोकपथ नीलामी की भाषा नहीं जानता। मेरे देश में आज भी आधी टांग की धोती पहने कितने गांधी अपने सत्य की राह पर सन्नद्ध हैं। एक ‘सूट’ से परिवार भर की शादी करने को मोहताज है आज भी समाज का एक तपका। दरजी ने जो सूट सिला वह इतिहास का दस्तावेज बनकर पुश्तैनी संपत्ति की तरह संजोया गया है आज भी भारत के कई घरों में। गरीबी रेखा के इस पार धोती और अमीरी रेखा के उस पार सूट यही देश की आँगन की सरहदें हैं। भारत के पहरुवा, जिसपर गरीबों की पथराई आँखे आस लगाये बैठी हैं उसके बदन पर स्वनाम के अंतहीन कशीदे में गरीबों के बलिदान का अक्स उभर गया। हतप्रभ तो गांधी की आत्मा भी होगी। उपहार में मिले सामानों की नीलामी तो विपत्ति में भी नहीं की जाती। लोकतंत्र के मायने और तकनीक का यह बदलता हुवा अस्तित्व है।

जीवन की तीन मौलिक जरूरतों में से सबसे अहम कपड़ा है। आज भी देश के 20 फीसदी भारतीयों को सभ्य दिखने के लिए कपड़े नसीब नहीं हैं। कइयों के पास इतना भी धन नहीं होता कि वे नए वस्त्र खरीद सकें। रोटी के बाद कपड़े की जरुरत दूसरे नंबर पर है, और मकान उसके बाद में। लेकिन आज पहले कपड़ा चाहिए फिर रोटी। बिना कपड़े रोटी कमाने निकलने वालों को लोग असभ्य कहते हैं। जो जितना अच्छा कपड़ा पहनता है उसे उतना ही सभ्य और समृद्ध माना जाता है। बिन कपड़े का मानव पहले भी आदम था आज भी है। सड़क किनारे का भारत आज भी ‘सेकेण्ड-हैण्ड’ कपड़े पहनकर तरक्की की आपाधापी में समतुल्य होता है। कोई फेरी वाले से बर्तन देकर कपड़े मोल करता है तो कोई कपड़े देकर बर्तन मोल लेता है।फुटपाथ गरीबों के लिए खुशियां खरीदने का ठिकाना। घर-घर से इकट्ठा हो कर कपड़ा फुटपाथी बाजारों में बिकता है। हिन्दुस्तान का एक पट्टी ऐसा भी है । सत्ता के लिए गरीबी बने रहना जरूरी है, ताकि लोग भूख, रोज़गार और इलाज की जद्दोजहद से जूझते रहें, कोई सवाल न पूछें, बहस और संघर्ष न कर सकें, अपने हकों की बात न करे सकें| और पूँजी के पुजारी राजनीति का लबादा ओढ़ कर ऐसी नीतियां लागू करते रहें जिससे संसाधनों और व्यवस्था पर उनका नियंत्रण बना रहे।

भारतीय वस्‍त्र एवं कपड़ा उद्योग, राष्‍ट्रीय अर्थव्‍यवस्‍था के आधारों में से एक है। यह भारत के निर्यात में सबसे ज्‍यादा योगदान देने वाले क्षेत्रों में से है। देश के कुल निर्यात में इसकी हिस्‍सेदारी करीब 13.25 प्रतिशत है। वस्‍त्र उद्योग गहन श्रम वाला उद्योग है और यह सबसे ज्‍यादा कर्मचारियों वाले क्षेत्रों में से एक है। वस्‍त्र उद्योग ने वर्ष 2013-14 में निर्यात से 41.57 बिलियन डॉलर अर्जित किए। वस्त्र उद्योग के मोटे तौर पर दो खंड हैं : असंगठित क्षेत्र में हथकरघा, हस्‍तशिल्‍प, रेशम उत्‍पादन और पावरलून तथा संगठित क्षेत्र में कताई, वस्‍त्र, परिधान, कृत्रिम।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dhirchauhan72 के द्वारा
February 21, 2015

जहां लोगों के पास रहने को घर क्या एक पूरा कमरा नहीं है और एक तरफ एक पूर्व अय्यास प्रधानमंत्री ने मरने के बाद भी तीस एकड़ में फैला हुआ बंगला नहीं छोड़ा ( त्रिमूर्ति भवन) और कोंग्रेश तो आज भी कई बंगले दिल्ली में कब्जा किये हुए है….. उनका क्या ….? कपडे और बाकी चीजें तो रहने ही दीजिये ! जिनकी चड्डी भी मोदी के सूट से महंगी आती होंगी ऐसे नेताओं से भरी पड़ी है कांग्रेस ! चमचागिरी ठीक है लेकिन बिना अकल वाले लोग भी आजकल लेखक बन गए हैं …….! १९४७ में भी भारत गरीब था और सचाई ये है की नेहरू के एक टाइम के खाने का खर्च १३००० से १४००० के बीच था आज कल के २००००० से २५०००० रूपए के बराबर ! अँधा होना ज्यादा ठीक है ऐसे मानसिक गुलामी के पीड़ित लोगों के लिए !

jlsingh के द्वारा
February 20, 2015

आदरणीय यतीन्द्र नाथ जी, सादर अभिवादन! आपने सही फ़रमाया है. मोदी जी के मन में आजकल क्यों उलटे सीधे ख्याल आ रहे हैं. परिस्थतियां जब बदलने लगती है तो हर दांव उल्टा पड़ने लगता है. वैसे वे तो खुद परम ज्ञानी हैं पर कपड़ों से बहुत लगाव है फैशन में बने रहना चाहते हैं एक सूटवाला इसी देश में सूट छोड़कर खड़ी की धोती में आया था और उस लंगोटी में जो दम था उससे हम सभी परिचित है. सादर!


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