कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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खेतिहर संकट

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_क्या देश भूखा ही सो जायेगा! यह कैसा ‘शस्य श्यामलाम्’ वन्दे मातरम का ‘भूमि-अधिग्रहण’ गान है जहाँ उद्योग की सेहत सुधारने के लिए ग्राम देवता को बेदखल किया जा रहा है। भारत माता के पुजारी धरती माता को उसके अन्नमय कोष से उसे वंचित कर रहे हैं। जब ‘खेत’ नहीं रहेंगे तब ‘जय श्री राम’ के लिए ‘शबरी’ के बेर कहाँ से आएंगे! 510,072,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाली इस ग्रह पृथ्वी पर पुरखों द्वारा विरासत में मिले मुट्ठी भर जमीन का बादशाह ग्राम देवता आज संकट में हैं। दिल्ली आज भी गांव के गरीब-गुरबा लोगों के लिए एक जादुई शब्द है। पर खेद है कि किसानों के सपने को हड़पने का खाका उसी दिल्ली ने तैयार किया है। खेती ही नहीं रहेगी तो खेतिहर और उनका परिवार खायेगा क्या?

रोटी के खिलाफ कमल किस ‘1857′ और ‘फ़्रांस के रोटी-क्रांति’ को उकसा रहा है । बात सस्ते दिनों की थी, पुरुखों की वसीयत लेने की नहीं। किसान तो अनाथ मर ही रहा था, अब सरकार भूमि का गला घोंटने को बे-सब्र है। ‘भूमि अधिग्रहण’ ‘अन्न-दाता’ ही नहीं बुनकरों, मजदूरों, विपन्नो और फटे-हालों, रिक्शा-चालकों और माध्यम वर्गीय के पेट पर लात मारना है। महंगाई की मार अभी कम ही थी क्या जो ‘भूमि अधिग्रहण’ की सुनामी लहर आ गयी। विकास की किसान विराेधी एवं अंधी पूजींवादी अवधारणा किसान को चरवाहा बना देगी। यह देश जहां संसद 51% वोट के आधार पर निर्णय लेती है, वहां भूमि अधिग्रहण के लिए 70 फीसदी किसानों की सहमति को खत्म कर दिया गया है। किसानों को अरसे के बाद ज़मीन अधिग्रहण में सहमति का अधिकार मिला था जिसे अब बदलकर किसानों को कमज़ोर किया गया है। अगर सरकार भूमि अधिग्रहण कर इसी तरह किसानों की ज़मीन छीनती रहेगी तो ‘अन्नदाता’ स्वयं काल का निवाला बनता ही जायेगा। एक किसान आत्महत्या केवल एक जान ही नहीं बल्कि देश के हज़ारों मुँह के निवालों की आत्महत्या है। यह कायनात केवल तभी तक है जब तक किसान के हाथों में हल है, जिस दिन कृषि बन्द हो जायेगी, दुनिया भूख से तड़प कर मर जाएगी। कृषिप्रधान देश में किसानों का कमज़ोर होना देश का कमज़ोर होना है! पहले बैंकों, महाजनों और बिचौलियों ने किसान को लूटा पर अब किसानों को लूटने का दायित्व भाजपा सरकार ने अपने हाथों ले लिया है। क्रांति-1857 का चिन्ह ‘रोटी और कमल’ था अब ‘कमल’ ने ‘रोटी’ को दबोचना शुरू कर दिया है। उद्योग की सेहत सुधारने के लिए ग्राम देवता को बेदखल किया जा रहा है।

गांधी ने आजादी, अध्यात्म, संस्कृति और सभ्यता को रोटी के गोल शून्य में समाहित देखा था और बिहार के चंपारण में किसानों की दुर्दशा से अभी भूत हो कर राष्ट्रीय आंदोलन का बिगुल फूंका था और अग्रेज तीन दशक भी सामना नहीं कर सके । वर्तमान केंद्रीय सत्ता में पहुंचे किसान विरोधियों को अपना भविष्य समाप्त न करने की सलाह देनी ही चाहिए यद्यपि यह हितकारी सलाह प्रिय नहीं लगेगी क्योंकि प्रिय और हितकारी शब्द एक साथ नहीं बोले जा सकते और नहीं सुने जा सकते है।

1965 के भारत पाक युद्ध में पीएल 480 के अंतर्गत भारत को मिलने वाले सड़े हुवे गेहू, मक्का और चावल की आपूर्ति को भारतीय सैनिक जब आगे बढ़ रहे थे तब अमेरिका ने अनाज रोकने के लिए गल्ला न देने को हथियार के रूप में प्रयोग किया था जिसके उत्तर में ‘जय-जवान जय-किसान’ का कृषि और उसके खेत हमारे सीमा के प्रहरी बने थे यह राष्ट्रीय सत्य भूल गए राष्ट्रवादी पार्टी और उसके पीएम का यह कैसा राष्ट्रप्रेम है। “जय जवान जय किसान” के देश में सरकार की उदासीनता की वजह से जवान सीमा पर और किसान खेतों में मर रहा है।

श्रीमति इंदिरा गांधी ने कभी उद्योगो के लिए असिंचित क्षेत्रों का चयन किया था न की कृषि योग्य भूमि का। अधिक उत्पादकों को कृषि पंडित का लाखों रुपयों भरा पुरस्कार देना आयोजित किया था जबकि आज उद्योग पंडित को करोड़ों का राष्ट्रीय अलंकरण बेचा जायेगा।

भारत में 70 फीसदी लोग गावों में बसते हैं। किसानो के हितों के फैसले उनसे नहीं पूछे जाते। जमीन को खाद-पानी नहीं राजनीतिक जंग के रण-क्षेत्र में धकेला जा रहा है। अन्नमय कोष पर ही विज्ञानमय कोष खड़ा होता है तभी आनंदमय कोष ढकार लेता है। भय और भूख दोनों से भारत के बहुसंख्यक मतदाता अन्नाभाव से कुपोषित आक्रांत होकर जिन्दा रहने पर मजबूर है या फिर भुखमरी और अन्न आपदा के आतंक से असमय ही काल के शिकार हो रहे है। इस देश में नकदी फसल उगाना बहुत महंगा सौदा है। किसानों की आत्महत्या कहा जाए, जैसा की पुलिस के दस्तावेजों में दर्ज है या फिर हमारी राजनीतिक व्यवस्था द्वारा सुनियोजित तरीके से किया जा रहा नरसंहार। पीढ़ी दर पीढ़ी जंगलों में रह रहे आदिवासियों को जंगलों पर अधिकार से भी वंचित रहना पड़ा है। किसान और उसकी खेती को जमींदोज कर ग्राम देवता के निवाले दांव पर लगा कांक्रीट का जंगल बोया जा रहा है।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
March 14, 2015

श्री यतीन्द्र जी ! चिंतन का समर्थन i समय आगया है जब एक व्यक्ति को एक कमरा,बस i अनिवार्य साधनों की आपूर्ति i अपने हक़ में बस इतना ही आकास हो i प्रजा तंत्र में आलोचना ही नहीं स्वयं संयमित होना भी आवश्यक होता है आपनें यह नहीं बताया कि क्या किया जाय आकास गंगा कैसे बहाई जाय ?

Bhola nath Pal के द्वारा
March 14, 2015

श्री यतीन्द्र जी ! चिंतन का समर्थन i समय आगया है जब एक व्यक्ति को एक कमरा,बस i अनिवार्य साधनों की आपूर्ति i अपने हक़ में बस इतना ही आकास हो i प्रजा तंत्र में आलोचना ही नहीं स्वयं संयमित होना भी आवश्यक होता है आपनें यह नहीं बताया कि क्या किया जाय सस्कस गंगा कैसे बहाई जाय ?

jlsingh के द्वारा
March 14, 2015

आदरणीय यतीन्द्र जी, अच्छे आलेख और श्रेष्ठ ब्लोग्गर सम्मान के लिए बधाई!

rajanidurgesh के द्वारा
March 1, 2015

यतीन्द्रजी बहुत सही लिखा है आपने. इस तरह के लेखन में आजकल कमी आ गयी है. बधाई!


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