कलम-पथ

शब्द जिन्दगी के_____यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

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आदि शंकराचार्य के ज्योतिष-पीठ की जीत हुवी

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15_YATINDRA jpeg[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]_ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य पद पर न्याय और धर्म के ध्वजारोहण के साथ आदि शंकराचार्य जी के संकल्प की जीत हुवी। अंधकार उजाले से हार गया। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महराज की पावन स्मृति इस जीत पर सामने आकर खड़ी होगयी। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित महानुशासनम् में लिपिबद्ध नियमानुसार स्वतान्त्र्यवीरोत्तम स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज को 7 दिसंबर 1973 को ज्योतिर्मठ का परंपरागत जगतगुरु शंकराचार्य बनाया गया । 27 वर्षीय इस अति लम्बे समय से चले आ रहे वाद का न्यायिक विवेचन आदि शंकराचार्य भगवान के आध्यात्मिक प्रशासन, धर्म-दर्शन, संस्कृति, जैसे चिरंतन मूल्यों की सुदृढ़ स्थापना के संकल्प की न्याय के मंगल-थाल में एक भव्य राष्ट्रीय एकता की आरती है। शंकराचार्य के चारों पीठ राष्ट्रीय समन्वय एकता एवं प्रेम की चार श्रद्धानीय दिशाएं है यह एक ऐसा सांस्कृतिक मानचित्र है जो धर्म के मूलतत्वों का समाजीकरण करता है जिसे सभी वर्ण,जाति, सम्प्रदाय एक राष्ट्रकुल के रूप में अनुभूति के अध्याय पर सहस्राब्दियों से समय ने अपने हांथों से रचा है। इसको विवाद का विषय बनाना सनातन धर्म एवं विधिक संहिताओं की अतिक्रमण करना था। न्याय पीठ ने इस अतिक्रमण को रोक कर भ्रम की भीड़ से लगे जाम को हटाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। न्याय प्रकट हुवा यह देश और विश्वभर के भारतवंशी सनातन धर्मियों के लिए सुखद है। प्रश्न हार और जीत का उतना नहीं, जितना सनातन मूल्यों में आस्था का है। आशा है स्वयं को पराजित समझने वाले पक्ष भी इस न्यायिक मीमांसा को ह्रदय से स्वीकार करेंगे।

भारतवर्ष का वैदिक सनातन धर्म एवं दर्शन शंकराचार्य परंपराओं से उसी प्रकार होता था जैसे बाहरी शत्रुओं के हमलों से सेना राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित रखती है। चार वेदों की स्वाध्याय व्यवस्था के लिए प्रमुख चार शंकर मठों में से एक उत्तर के बद्रिकाश्रम, ज्योतिर्मठ, जहाँ अथर्ववेद की संपूर्ण शाखाओं के पठन-पाठन की व्यवस्था है। सर्व विदित है कि द्वारिका शारदा पीठ एवं ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य श्री स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी द्वारा देश भर में कई अन्नक्षेत्र, गौशाला, संस्कृत विद्यालय, बाल विद्यालय, आयुर्वेद-औषधालय, अनुसन्धानशाला, वृद्धाश्रम, आदिवासी-शाला, आदि संस्थाएं चल रही हैं. वह स्वयं भ्रमण करते हुए संस्थाओं का सम्यक संचालन और धर्मप्रचार करते रहते हैं।_[यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी]



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